1. अनोखी घटना - Page 27

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

II

उपर्युक्त वक्तव्यों से दो प्रश्न उभरते हैं जिनका स्पष्टीकरण आवश्यक है। प्रथम, यह जानना है कि सामाजिक सुधार पार्टी क्या थी जिसका उल्लेख अध्यक्षों ने अपनी भाषाओं में किया था। दूसरा प्रश्न यह है कि वर्ष 1895 में कांग्रेस अधिवेशन में श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का भाषण अंतिम भाषण क्यों माना गया जबकि किसी कांग्रेस अध्यक्ष ने सामाजिक सुधारों की समस्या के प्रति कांग्रेस के उत्तरदायित्व का उल्लेख करना अनिवार्य नहीं समझा गया और 1895 के बाद कांग्रेस के किसी अध्यक्ष ने इस पर विचार करना अनिवार्य क्यों नहीं समझा।

पहले प्रश्न को समझने के लिए इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि वर्ष 1885 में बंबई में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई तब दल के नेताओं ने महसूस किया था कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनैतिक ही नहीं वरन् राजनैतिक प्रश्नों पर विचार करने के साथ-साथ भारतीय सामाजिक आर्थिक स्थिति को प्रभावित करने वाले प्रश्नों पर भी विचार किया जाए और सभी सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों को समाप्त कर हिंदू समाज को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए सभी भरसक प्रयत्न किए जाने चाहिए। इस विचार को ध्यान में रखते हुए दीवान बहादुर आर. रघुनाथ राव तथा न्यायमूर्ति श्री एम.जी. रानाडे (तत्कालीन राय बहादुर) ने बंबई में कांग्रेस की प्रथम बैठक में समाज सुधार पर विचार व्यक्त किए थे। वर्ष 1886 में कलकत्ता में कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया गया। कांग्रेस आंदोलन के नेताओं में तथा भारतीय शिक्षित विचारधारा के अन्य नेताओं के साथ इस समस्या पर विचार-विमर्श चलता रहा कि क्या कांग्रेस को इस समस्या पर विचार करना चाहिए अथवा क्या सामाजिक प्रश्नों पर चर्चा करने के लिए अलग से समिति का गठन किया जाना चाहिए। दीवान बहादुर आर. रघुनाथ राव, श्री महादेव गोविंद रानाडे, श्री नरेन्द्र नाथ सेन तथा श्री जानकी नाथ घोषाल तथा अन्य विद्वानों द्वारा गंभीर विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय किया गया कि इंडियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस नाम से अलग से संस्था बनाई जानी चाहिए जो भारतीय सामाजिक अर्थव्यवस्था संबंधी विषयों पर विचार करे। इंडियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस का प्रथम अधिवेशन दिसंबर 1887 में मद्रास में हुआ और इसे ही इस कांफ्रेंस की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त हुआ। स्वर्गीय महाराज सर टी. माधव राव के सी.एस.आई. जो अपने समय के उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ थे, इस कान्फ्रेंस के अध्यक्ष थे। इस प्रथम कांफ्रेंस में कोई अधिक काम नहीं हुआ। अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों में जो तत्कालीन सदस्यों ने पारित किए थे उनमें एक प्रस्ताव यह भी था कि भारत के विभिन्न स्थानों पर इंडियन नेशनल कान्फ्रेंस के वार्षिक