246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि मैंने राय बहादुर मेहर चंद खन्ना का बयान उद्धृत किया है, तो इसलिए नहीं कि वह ध्यान देने योग्य है, वरन् इसलिए कि भारतीय राजनीति में इतने गुल खिलाने वाला उनके सिवाए और कोई नहीं है। एक ही वर्ष के अंदर वर्ष 1944 में
खन्ना ने सफलतापूर्वक तीन भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने हिंदू महासभा का मंत्री बनकर अपना कार्य आरंभ किया, ब्रिटिश सरकार के दलाल बने, समुद्र पार गए, अंग्रेजों और अमरीकियों के सामने भारत की लड़ाई की स्थिति स्पष्ट करने गए और अब वह पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में कांग्रेस के गुर्गे के रूप में कार्य कर रहे हैं। राय बहादुर
खन्ना के विषय में, जो मैंने उदाहरण दिए हैं, वे केवल यह दिखाने के लिए हैं कि श्री गांधी के मित्र अस्पृश्यों को गुमराह कर बहकाने के लिए किस प्रकार का हथकंडा अपना रहे हैं। ख्1,
मैं नहीं जानता कि कितने अस्पृश्य इस झूठ को पचाने के लिए तैयार होंगे। परंतु, जैसा कि नाजियों ने सिद्ध किया है, यदि झूंठ बड़ा झूंठ है, तो उसे तब तक लगातार उगलते रहो, जब तक कि लोग उसे सत्य न मानने लगें। इसलिए मेरे लिए यह आवश्यक हो गया है कि मैं अस्पृश्य के आंदोलन में और अस्पृश्यों को बरगलाने वाले और उन्हें लुभाने वाले प्रचार में श्री गांधी द्वारा खेले गए नाटक का पर्दाफाश करूं।
II
श्री गांधी द्वारा निभाई गई भूमिका की परतें उघाड़ते समय पहले इसी बात पर विचार करना है कि श्री गांधी ने सबसे पहले यह कब अनुभव किया कि अस्पृश्यता पाप है। इस विषय में हमारे पास सीधे श्री गांधी का ही साक्ष्य है। सप्रेस्ड क्लासेज कांफ्रेंस का, जो अहमदाबाद में 14 व 15 अप्रैल, 1921 को हुई थी, सभापतित्व करते हुए श्री गांधी ने कहा थाःµ
फ्जब मैं मुश्किल से 12 वर्ष का था, तभी यह विचार मेरे मन में पैदा हुआ
था। एक झाडू लगाने वाला जिसका नाम ऊखा था, जो अस्पृश्य था, वह मेरे
घर की टट्टी साफ किया करता था। अक्सर मैं अपनी मां से पूछ बैठता था
कि उसे छूना क्यों ठीक नहीं है और मुझे उसे छूने से क्यों रोका जाता है।
यदि कभी अचानक मैं ऊखा से छू जाता तो मुझे अपने शरीर को शुद्ध करने
और प्रायश्चित करने के लिए कहा जाता था और यद्यपि मैं उनकी आज्ञा का
पालन करता था, परंतु मुस्कराते हुए यह विरोध भी प्रकट कर दिया करता
- इसी प्रकार का एक प्रोपेगंडा प्रो. ए.आर. वाडिया नामक पारसी सज्जन ने किया था। उसके कथन की
श्री ई.जे. संजन्ना ने बखिया उधेड़ी थी जो बम्बई से 29 अक्तूबर, 1944 से अप्रैल 1945 तक प्रकाशित
होने वाले गुजराती साप्ताहिक में उपलब्ध है। उसका शीर्षक है फ्सैन्स एंड नॉनसैन्स इन पॉलिटिक्स।य्