अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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था कि अस्पृश्यता को धर्म की कहीं स्वीकृति नहीं मिली हुई है। मैं बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ और आज्ञाकारी लड़का था और माता-पिता की आज्ञा का पालन दृढ़ता से करता था। अक्सर मैं इस विषय पर उनसे वाद-विवाद कर बैठता था। मैंने अपनी मां से कह दिया था कि शरीर से ऊखा के छूने से कोई पाप नहीं लग जाता और ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।
फ्मैं स्कूल में अक्सर अस्पृश्यों से छू जाता था और मैं उस सच्चाई को अपने माता-पिता से कभी नहीं छिपाता था। मेरी मां मुझे कहा करती थी कि अपवित्र से छू जाने पर अपने को शुद्ध करो और पास से गुजरते हुए मुसलमान को स्पर्श करके अशुद्धता मुक्त हो जाओ और मैं अक्सर अपनी मां का आदर करते हुए उनकी बात मान लेता था, परंतु मैंने उस बात पर कभी विश्वास नहीं किया कि यह धार्मिक रूप से आवश्यक है। कुछ समय के बाद हम लोग पोरबंदर चले गए जहां मैं पहले संस्कृत के संपर्क में आया। उस समय तक मुझे अंग्रेजी स्कूल में नहीं रखा गया था और मुझे तथा मेरे भाई को एक ब्राह्मण के शिष्यत्व में रखा गया, जिसने हमें राम रक्षा और विष्णु पुंजर की शिक्षा दी। फ्जले विष्णुय्, फ्स्थले विष्णुय् जो मेरे मुख्य पाठ थे मेरी स्मृति से दूर नहीं हो सके। पास में ही एक गृहस्थ बुढि़या रहती थी। मैं उस समय बहुत डरपोक था, जहां कहीं अचानक प्रकाश होता और बुझते देखता, तो मुझे भूत-प्रेतों जैसा प्रतीत होता। वृद्धा मां मुझे डरते हुए देखकर ढाढ़स बंधाती और मुझे सलाह देती कि डर जाने पर फ्राम रक्षाय् का पाठ करने लगूं जिससे बुरी आत्माएं भाग जाएं। मैं उसका पाठ करते समय उसका अच्छा प्रभाव समझता था। तब मुझे यह विश्वास नहीं था कि फ्राम रक्षाय् में कहीं कोई ऐसी बात है जिसमें अस्पृश्यों का छू जाना पाप समझा गया हो। तब मैं उसका अर्थ नहीं समझता था अथवा बहुत कम अर्थ जानता था। परंतु मुझे विश्वास था कि फ्राम रक्षाय् से भूत-प्रेतों से उत्पन्न सभी प्रकार के भय नष्ट हो सकते हैं, परंतु इस बात की आशंका नहीं थी कि अस्पृश्यों को छू लेने में कोई भय हो सकता है।
हमारे परिवार में रामायण का पाठ नियमित रूप से किया जाता था। एक ब्राह्मण जिसका नाम लद्धा महाराज था, यह पाठ किया करता था। वह कुष्ठ रोग से पीडि़त था और उसे विश्वास था कि रामायण का लगातार पाठ करते रहने से उसका कुष्ठ दूर हो जाएगा और वास्तव में वह रोगमुक्त हो गया। मैं अपने आप में सोचता था कि आज अस्पृश्य कहा जाने वाला