250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आंदोलन स्थगित किया, मार्च 10, 1922 को गिरफतार हुए और 6 वर्ष
की साधारण कैद हुई।य्
यह टिप्पण सही प्रतीत नहीं होती। इसमें श्री गांधी के जीवन की प्रमुख घटनाएं छूट गई हैं। इसे पूरा करने के लिए निम्नांकित बातें भी जोड़ी जानी चाहिएःµ
फ्वर्ष 1919 में ब्रिटिश साम्राज्य से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अफगान
आक्रमण का स्वागत करने की तैयारी की घोषणा की, बारदौली कार्यक्रम को
रचनात्मक रूप देने के लिए 1920 में देश के समक्ष प्रस्ताव लाए, 1921 में
तिलक स्वराज्य फंड आरंभ किया और एक करोड़ 25 लाख रुपए देश के
लिए स्वराज्य की लड़ाई में उपयोग करने के लिए एकत्र किए।य्
इन पांच वर्षों में गांधी जी कांग्रेस को ऐसे सैनिक संगठन अर्थात् एक युद्ध तंत्र का रूप देने में पूर्णतया तल्लीन थे जो साम्राज्यवाद की जड़ें हिला दे। मुसलमान कांग्रेस में शामिल हो गए क्योंकि उन्होंने खिलाफत आंदोलन का पक्ष लिया और हिंदुओं द्वारा खिलाफत आंदोलन का पूरा समर्थन किए जाने के लिए भरसक प्रयत्न किया।
उस अवधि में श्री गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया? निस्संदेह कांग्रेसी उसके उत्तर में बारदौली आंदोलन का उल्लेख करेंगे। यह सच है कि बारदौली कार्यक्रम में अस्पृश्योत्थान भी एक मद थी। परंतु जिज्ञासा की बात यह है कि उस मद का क्या हुआ? संक्षेप में बात यह है कि बारदौली आंदोलन में अस्पृश्यता निवारण की कोई योजना नहीं थी। वह कार्यक्रम उन्नति और सुधार का कार्यक्रम था, जो डिजरैली के शब्दों में प्राचीन संस्थाओं एवं आधुनिक प्रगति के सम्मिश्रण जैसा कार्यक्रम था। कार्यक्रम में अस्पृश्यता समस्या को मान्यता दी गई और योजना बनाई गई कि अस्पृश्यों के लिए अलग कुएं और अलग स्कूलों का प्रबंध किया जाए। अस्पृश्यों की उन्नति की योजना बनाने के लिए, जो उपसमिति बनाई गई, उसमें वे लोग थे, जिन्हें अस्पृश्यों के हितों में कोई रुचि नहीं थी और उनमें से कुछ तो अस्पृश्यों को देखकर नाक-भौं चढ़ाते थे। स्वामी श्रद्धानंद ही उस उप-समिति में ऐसे व्यक्ति थे, जो उनकी पीड़ा से अभिभूत थे। वह वास्तव में मौलिक रूप से अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहते थे परन्तु उन्हें भी विवश होकर त्यागपत्र देना पड़ा। उस समिति का कार्यक्रम चलाने के लिए मुट्टòी भर धनराशि दी गई थी। समिति की एक बैठक भी नहीं हुई और वह भंग कर दी गई। अस्पृश्योत्थान का कार्य हिंदू महासभा को सौंपने की घोषणा की गई। श्री गांधी ने बारदौली कार्यक्रम की उस योजना को कार्यान्वित करने में कोई रुचि नहीं दिखाई, जो अस्पृश्यों से संबंधित थी। स्वामी श्रद्धानंद का पक्ष लेने के बजाए,