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अस्पृश्य क्या कहते हैं?

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इस कार्यक्रम का पालन करने वाले कांग्रेस के पदाधिकारी होने के योग्य होंगे और जो लोग उस बहिष्कार के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते और उन बहिष्कारों का पालन नहीं करते, वे स्वतः ही अपनी उम्मीदवारी खो बैठेंगे।

उस समय भी गांधी जी अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन छेड़ सकते थे। वह ऐसा प्रस्ताव ला सकते थे कि यदि हिंदू अपने को कांग्रेस का सदस्य बनवाना चाहते हैं, तो पहले उन्हें प्रमाण देना होगा कि वे छुआछूत नहीं मानते और अपने प्रमाण की पुष्टि में अपने घरेलू काम काज के लिए अस्पृश्य को नौकर रखे हुए है। इसके सिवाए और कोई प्रमाण नहीं माना जाएगा। ऐसा प्रस्ताव बहुधा सभ्ी हिंदुओं पर लागू करना दुष्कर नहीं हो सकता था। वास्तव में वे सवर्ण हिंदू कहे जाते हैं, और उनमें से अधिकतर ऐसे हैं जो एक से अधिक घरेलू नौकर रख सकते हैं। यदि श्री गांधी हिंदुओं को इस बात के लिए राजी कर सकते थे कि कांग्रेस का सदस्य होने के लिए सूत कताई आवश्यक है, तो श्री गांधी हिंदुओं को इस बात के लिए भी तैयार कर सकते थे कि कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने के लिए हिंदू अपने घरों में काम करने के लिए अस्पृश्य नौकर रखते। परंतु श्री गांधी ने ऐसा नहीं किया।

1924 से 1930 तक कोई काम नहीं हुआ। श्री गांधी ने उस अवधि में अस्पृश्यता निवारण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न कोई ऐसा कार्य किया जिससे अस्पृश्यों का उपकार हो। उस अवधि में श्री गांधी को अस्पृश्यों के हित में निष्क्रिय देखकर अस्पृश्यों ने एक आंदोलन चालू किया, जिसे सत्याग्रह कहते हैं। उस आंदोलन का उद्देश्य था सार्वजनिक कुओं से पानी लेने का अधिकार और सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त करना। महाद में चावदार तालाब सत्याग्रह, सार्वजनिक स्थानों से अस्पृश्यों को पानी भरने देने के अधिकार की मांग से शुरू हुआ। बम्बई प्रेसीडेंसी के नासिक जिले में स्थित कालाराम मंदिर पर किए गए सत्याग्रह का उद्देश्य हिंदू मंदिरों में अस्पृश्यों के प्रवेश करने के अधिकार को प्राप्त करना था। इसके अतिरिक्त अन्य और छोटे-मोटे सत्याग्रह हुए। वे दोनों सत्याग्रह इस विचार से मुख्य सत्याग्रह थे कि उनसे अस्पृश्यों और उनके विरोधी सवर्ण हिंदुओं का ध्यान इस पर केंद्रित हुआ। सत्याग्रहों से सारे भारत में कोलाहल मच गया। उन अस्पृश्य नर-नारियों को हिंदुओं ने अपमानित किया और उन्हें मारा-पीटा। बहुत से अस्पृश्य घायल हुए और बहुतों को सरकार ने इस आधार पर गिरफतार किया कि उन्होंने शांति भंग की। वह सत्याग्रह आंदोलन पूरे 6 वर्ष तक चलता रहा और 1935 में उस समय रुका, जब नासिक जिले में येवला में हुई सभा में अस्पृश्यों ने हिंदुओं द्वारा समान सामाजिक अधिकार देने से इंकार करने के परिणामस्वरूप हिंदू धर्म त्यागने का निश्चय किया। निस्संदेह वह सत्याग्रह आंदोलन कांग्रेस से अलग किया गया था। उन सत्याग्रहों की स्थापना