अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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संचालित सरकार कैसे बनाई जाए। जिस देश में समुदायों में भिन्नता हो, बहुसंख्यक हों, अल्पसंख्यक हों, जहां के लोगों में सामाजिक विषमता नहीं, बल्कि सामाजिक बैर-भाव भी हो, ऐसी परिस्थितियों में यह आम सहमति थी कि भारत में जनता द्वारा संचालित सरकार की संभावना तब तक नहीं हो सकती, जब तक विधायिका और कार्यपालिका में संप्रदायों के आधार पर प्रतिनिधत्व न हो।
उस सम्मेलन में अस्पृश्यों की समस्या जटिल समस्या बन गई। इसे नई दिशा का रूप दिया गया। प्रश्न यह था कि क्या अस्पृश्यों को पहले की भांति हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाए अथवा उन्हें सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर अपनी सुरक्षा स्वयं करने के लिए साधन उपलब्ध कराए जाएं। हिंदुओं की मर्जी पर छोड़ देने के तर्क का अस्पृश्यों ने पूरी ताकत से विरोध किया और वैसे ही संरक्षण देने की मांग की जैसे अन्य अल्पसंख्यकों को दिए गए थे। अस्पृश्यों की वह मांग सभी को स्वीकार्य थी, क्योंकि यह न्यायोचित और तर्कसंगत थी। उनका तर्क था कि आचरण का जो भेदभाव हिंदू और मुसलमानों में है, हिंदू और सिक्खों में है, हिंदू और ईसाइयों में है, वही हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच भी है। वह भेदभाव बहुत विस्तृत और गहन है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का मतभेद धार्मिक एवं सामाजिक दोनों है। हिंदुओं और मुसलमानों के मतभेद से मुसलमानों की तबाही नहीं हो सकती, क्योंकि हिंदुओं और मुसलमानों का संबंध स्वामी और सेवक का नहीं है, केवल विदेशी समझने की पृथकतावादी भावना है। जबकि हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच का मतभेद अस्पृश्यों की राजनीतिक तबाही का कारण बन सकता है, क्योंकि उन दोनों का संबंध स्वामी और सेवक का है। अस्पृश्यों का तर्क है कि अस्पृश्यों और हिंदुओं के बीच भेदभाव को समाप्त करने के लिए सदियों से प्रयत्न किए जा रहे हैं, परंतु कोई सफलता हाथ नहीं लगी और आगे भी कोई सफलता मिलने की आशा नहीं है। जब बहुसंख्यक हिंदुओं को सत्ता का हस्तांतरण किया जा रहा है, इसलिए अस्पृश्यों को भी वही राजनीतिक संरक्षण मिलने चाहिए, जो मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकों को दिए गए हैं।
उस समय श्री गांधी को अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूति दिखाने का अवसर मिला था। वह अस्पृश्यों की मांगों का समर्थन करके उन्हें हिंदुओं के अत्याचारों और दमन का सामना करने के लिए सक्षम बनाते। परंतु श्री गांधी ने उनके प्रति सहानुभूति तो क्या दिखाई, उल्टे पूरी ताकत से उनकी मांगों का विरोध करने के लिए अच्छे बुरे सभी हथकंडे अपनाए। उन्होंने अस्पृश्यों की मांगों का विरोध करने के लिए मुसलमानों से हाथ मिलाया, परंतु मुसलमान को फोड़ने में असफल होते देखकर, उन्होंने ब्रिटिश सरकार को वह निर्णय वापस लेने के लिए विवश करने के लिए आमरण अनशन