256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया, जिसमें मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के समान अस्पृश्यों को राजनीतिक अधिकार दिए गए थे। जब श्री गांधी अनशन में असफल रहे, तो उन्होंने अस्पृश्यों के साथ एक समझौता किया जिसे पूना पैक्ट कहते हैं, जिसमें अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकारों पर पानी फेर दिया गया।
वर्ष 1933 में गांधी जी ने दो आंदोलन चलाए। पहला आंदोलन मंदिर प्रवेश का था। ख्1, उन्होंने उस आंदोलन को दो तरीकों से चलने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी ली। पहला था अस्पृश्यों के लिए गुरूवयूर मंदिर खोलना। दूसरा था केंद्रीय विधानमंडल में श्री रंगा अय्यर द्वारा मंदिर प्रवेश विधेयक पास कराना। श्री गांधी ने कहा था कि यदि निश्चित तारीख तक गुरूवयूर मंदिर अस्पृश्यों के लिए नहीं खोला गया, तो वह आमरण अनशन करेंगे। परंतु गुरूवयूर मंदिर अब तक अस्पृश्यों के लिए बंद है। श्री गांधी का आमरण अनशन का वचन धरा रह गया। आश्चर्य की बात है कि आज तेरह वर्ष बीत गए, परंतु श्री गांधी ने अस्पृश्यों के लिए उस मंदिर को खुलवाने के लिए कुछ भी नहीं किया। वास्तव में श्री गांधी ने गवर्नर जनरल को मंदिर प्रवेश विधेयक को पेश करने की स्वीकृति देने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न किए। केंद्रीय सभा में कांग्रेस पार्टी को जिस विधेयक का समर्थन करना चाहिए था, प्रवर समिति को भेजते समय इस आधार पर उसका समर्थन करने से इंकार कर दिया कि इस विधेयक से हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी और अगले चुनाव में हिंदू कांग्रेस को इसका मजा चखाने के लिए चुनाव में हरा देंगे। उस विधेयक को कांग्रेस द्वारा विफल कर देने पर श्री रंगा अय्यर को बड़ी निराशा हुई। श्री गांधी ने इसकी कोई परवाह नहीं की, बल्कि उन्होंने इसके लिए कांग्रेस की खुलकर तारीफ की।
दूसरा आंदोलन जो श्री गांधी ने 1933 में शुरू किया, वह था हरिजन सेवक संघ ख्2, की स्थापना का। सारे भारत में उस संस्था की शाखाओं का जाल बिछाया गया। उस संघ की स्थापना करने के तीन उद्देश्य थे। पहला उद्देश्य था यह बताना कि हिंदू अस्पृश्यों के प्रति बहुत उदार हैं और उनेक उत्थान के लिए धन दे सकते हैं। दूसरा उद्देश्य था दैनिक जीवन में अस्पृश्यों की सेवा करना। तीसरा उद्देश्य था अस्पृश्यों के मस्तिष्क में उन हिदुंओं के प्रति विश्वास जमाना जो राजनीतिक मामलों में उनसे दुराव की नीति अपनाते थे। उन तीनों में से भी कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। पहले झटके में ही हिंदुओं ने संघ के लिए आठ लाख रुपयों का चंदा एकत्र किया, जो उसकी तुलना में नहीं के बराबर था जो उन्होंने राजनीतिक उद्देश्य के लिए करोड़ों रुपए के रूप में इकट्टòा किया था। इसके बाद हिंदुओं ने अपना हाथ खींच लिया। अब संघ सरकारी अनुदान पर निर्भर करता है अथवा श्री गांधी हस्ताक्षरों को बेचकर
विवरण के लिए देखिए अध्याय 4
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