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अस्पृश्य क्या कहते हैं?

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धनोपार्जन कर अथवा कुछ धनवानों और उन वणिकों की दानशीलता पर निर्भर कर रहा है, जो अस्पृश्यों से प्रेम होने के कारण नहीं, वरन् वे यह सोच कर कि ऐसा करके श्री गांधी को प्रसन्न रखना उनके लिए लाभदायक है। संघ की शाखाएं साल दर साल बंद कर दी जाती रहीं। संघ इतनी तेजी से सिकुड़ रहा है कि शीघ्र ही वह शाखारहित केंद्र रह जाएगा। संघ के प्रति हिंदुओं की दिलचस्पी नहीं रह गई है, वरन् इससे श्री गांधी के अफसोसनाक कार्यकलाप की झलक मिलती है। संघ उन अस्पृश्यों के बीच पैर जमाने और उनका सहयोग प्राप्त करने में असफल रहा, जिनके हितों की उससे आशा थी। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। संघ का कार्य बहुत उद्देश्यहीन है। संघ से कोई प्रभावित न हुआ। संघ उन सभी आवश्यक उद्देश्यों की उपेक्षा करता है जो अस्पृश्यों की उन्नति में सहायक होते हैं और आवश्यक हैं। संघ अस्पृश्यों को अपने प्रबंध में कठोरता से अलग रखता है। अस्पृश्य उनके लिए भिखारी से अधिक कुछ नहीं हैं और वे उनकी खैरात ही पा सकते हैं। जिसका परिणाम यह है कि अस्पृश्य संघ को पराया समझते हैं और उससे उनका कोई रिश्ता नाता नहीं है, जिसे हिंदुओं ने निपट स्वार्थ भावना से स्थापित किया है। यहां श्री गांधी को पुनः अवसर मिला था कि वह हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच सेतु बना पाते। वह संघ गतिविधियों में अस्पृश्यों को शामिल करके उस संस्था को उसके कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अधिक मजबूत और शक्तिशाली संस्था बना सकते थे। परंतु श्री गांधी ने कुछ नहीं किया। उन्होंने संघ को क्षीण होने दिया। संघ अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और श्री गांधी के जीवन काल में ही इसको निर्वाण प्राप्त हो जाएगा।

यदि श्री गांधी के अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन तथा उनकी कथनी और करनी का यह सर्वेक्षण पाठक को भ्रमित कर दे और पाठक अपना भ्रम दूर करने के लिए निम्नांकित मुद्दों पर प्रश्न करें तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहींःµ

(1) 1921 में श्री गांधी ने तिलक स्वराज्य फंड के लिए एक करोड़ पैंतीस लाख रुपए एकत्र किए थे। श्री गांधी ने जोर देकर कहा कि जब तक अस्पृश्यता का निवारण नहीं हो जाता, स्वराज्य प्राप्त करना संभव नहीं है। तब श्री गांधी ने अस्पृश्यों के हित में 43,000 रुपए की मुट्टòी पर धनराशि देने पर कोई आपत्ति क्यों नहीं की?

(2) 1922 में रचनात्मक कार्य की बारदौली योजना की रूपरेखा तैयार की गई। उसकी विस्तृत जानकारी के लिए एक समिति नियुक्त की गई थी। समिति ने कोई कार्य नहीं किया और भंग कर दी गई और बारदौली कार्यक्रम में अस्पृश्योत्थान की योजना निकाल दी गई। समिति के खर्चों को पूरा करने के लिए केवल 500 रुपए दिए गए थे। तब गांधी जी ने कांग्रेस कार्य समिति की इस कंजूसी और सौतेले व्यवहार के विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाई? गांधी जी ने स्वामी श्रद्धानंद का समर्थन क्यों नहीं