10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 275

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(14) मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. खरे के मंत्रिमंडल में अनुसूचित जाति के सदस्य, श्री अग्निभोज के शामिल करने को श्री गांधी ने क्यों नहीं अपनी स्वीकृति प्रदान की, जबकि श्री अग्निभोज मंत्री होने की सारी योग्याताओं को पूरा करते थे? क्या श्री गांधी कह सकते हैं कि वह अस्पृश्यों में उत्कट महत्वाकांक्षाएं पैदा करने के विरुद्ध हैं?

III

इन सब प्रश्नों के संबंध में श्री गांधी के पास क्या उत्तर है? श्री गांधी के मित्रों के पास इसका स्पष्टीकरण है? श्री गांधी के अस्पृश्यता निवारण आंदोलन में बहुत सी पेचीदगियां हैं, विरोधाभास और अस्थिरता है। कहीं आक्रामक भावना है तो, कहीं समर्पण की भावना पाई जाती है। आगे बढ़ना, पीछे हटना, जैसी रहस्यमय बातें हैं। वह इस आंदोलन की क्षमता में विश्वास करते हैं और अधिकांश संख्या में लोगों का कहना है कि इसके पीछे कोई ईमानदारी और निष्ठा नहीं है। इसलिए इसका कुछ स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। यह श्री गांधी की ईमानदारी और निष्ठा की कीर्ति फैलाने वाला प्रयत्न है, न कि उनके उद्देश्य और तौर-तरीकों को समझाने का। पाठक श्री गांधी और उनके अनुयायियों से यह जानने के लिए इन प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करते हैं।

निस्संदेह पाठकों को यह जानने की उत्कंठा होगी कि श्री गांधी और उनके मित्र इन प्रश्नों के उत्तर में क्या कहना चाहते हैं? जो इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता है, उसके लिए यह स्वाभाविक है कि उत्तर सुनने की उसकी उत्कंठा होगी। वे चाहे जिस ढंग से और जब चाहें उत्तर दें, हम उन पर छोड़ते हैं। फिलहाल यह हमसे पूछा जा सकता है कि श्री गांधी तथा उनके अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन के विरुद्ध अस्पृश्य क्या कहना चाहते हैं। श्री गांधी के आंदोलन के संबंध में अस्पृश्यों का दृष्टिकोण स्पष्ट करना कठिन नहीं है।

क्या अस्पृश्य श्री गांधी को अपनी मांगों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति के रूप में देखते हैं? उत्तर नकारात्मक है। वे श्री गांधी में निष्ठा की कोई झलक नहीं पाते। यह कैसे हो सकता है? वे उस मनुष्य को अपनी मांगों के प्रति कैसे गंभीर मान सकते हैं जो 1921 में जो बारदौली कार्यक्रम के कार्यान्वयन में अस्पृश्यता निवारण के विरुद्ध रहा हो? वे उस मनुष्य को कब और कैसे अपनी मांगों के प्रति ईमानदार मान सकते हैं जिसने स्वराज्य फंड के लिए एकत्र किए गए एक करोड़ 25 लाख रुपयों में से चिर-उपेक्षित अस्पृश्यों के हित में कंजूसी से केवल 43 हजार रुपए स्वीकार किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की? वे उस व्यक्ति से क्या आशा रख सकते हैं जिसने 1924 में अस्पृश्यता निवारण के लिए हिंदुओं को विवश करने का अवसर मिलने पर