अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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भी, कुछ नहीं किया यद्यपि उसे उस समय शक्ति और अवसर दोनों प्राप्त थे? ऐसा करने से तीन उद्देश्यों की प्राप्ति होती। इससे कांग्रेस के राष्ट्रवाद की परीक्षा हो जाती। इससे अस्पृश्यता निवारण में सहायता मिलती और इससे यह भी सिद्ध हो जाता कि क्या श्री गांधी अस्पृश्यता की बुराई के बारे में जो कहते हैं वह हृदय से कहते हैं और इसे एक पाप तथा हिंदू धर्म पर कलंक मानते हैं। परंतु श्री गांधी ने ऐसा क्यों नहीं किया? क्या इससे यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि गांधी जी को अस्पृश्यता निवारण की अपेक्षा चरखा कातने में अधिक रुचि थी? क्या इससे यह नहीं प्रतीत होता कि अस्पृश्यता निवारण का श्री गांधी के कार्यक्रम में कोई विशेष स्थान नहीं है? क्या इससे यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि श्री गांधी अपने बयानों में जो कहा करते थे कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर धब्बा है और अस्पृश्यता निवारण बिना स्वराज्य नहीं होगा - यह केवल लारालप्पा एवं धोखा था। इसके प्रति उनकी कोई ईमानदारी नहीं थी? वे श्री गांधी पर कैसे विश्वास कर सकते हैं जिन्होंने गुरूवयूर मंदिर को अस्पृश्यों के लिए न खोलने पर अनशन करने का वचन दिया, मंदिर न खुलने पर उन्होंने अनशन पर चुप्पी साध ली। मंदिर उनके लिए हमेशा के लिए बंद हो गया? पहले तो श्री गांधी ने मंदिर प्रवेश विधेयक को पेश कराने का प्रयत्न किया परंतु बाद में उस तरफ से हाथ खींच लेने के लिए वह भी सहमत हो गए। इस स्थिति में उन पर कैसे विश्वास किया जाए? श्री गांधी की निष्ठा में कैसे विश्वास किया जाए, जो यह कहते रहे हैं कि मैं उस मंदिर में नहीं जाऊंगा, जो अस्पृश्यों के लिए न खोला गया हो। तब तो उन्हें अस्पृश्यों के लिए मंदिर खुलवाने के लिए सभी प्रकार के प्रयत्न करने चाहिए थे, परंतु उन्होंने क्या किया? श्री गांधी में कैसे विश्वास किया जाए, जो छोटी-छोटी बातों पर अनशन कर बैठते थे, परंतु अस्पृश्यों के पक्ष में कभी अनशन नहीं किया? श्री गांधी में अस्पृश्य कैसे विश्वास करें जो अपने प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तो सत्याग्रह करते हैं, परंतु अस्पृश्यों के लिए हिंदुओं के विरुद्ध कोई सत्याग्रह नहीं करते? वे अस्पृश्य श्री गांधी में कैसे विश्वास करें, जो केवल अस्पृश्यता के दोषों पर उपदेश देने में कुशल हैं, पर अस्पृश्यों के लिए कुछ करने के नाम पर शून्य?
क्या अस्पृश्य श्री गांधी को उनके ऐसे कर्मों के कारण ईमानदारी और निष्कपटता का दर्जा दे सकते थे? वे कहते हैं कि श्री गांधी ईमानदार नहीं हैं। स्वराज्य आंदोलन के समय श्री गांधी ने अस्पृश्यों से ब्रिटिश सरकार का पक्ष लेने का अनुरोध किया था। उन्होंने उनसे ईसाइयत अथवा अन्य कोई धर्म न ग्रहण करने का अनुरोध किया। उन्होंने उनसे कहा था कि इसका हल हिंदू धर्म में ही निकल आएगा। श्री गांधी ने हिंदुओं से अस्पृश्यता निवारण को स्वराज्य प्राप्ति की एक शर्त बतलाया था। तब भी 1921 में तिलक स्वराज्य फंड से अस्पृश्यों के लिए अत्यंत कम धनराशि 43 हजार