10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 277

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

रुपए स्वीकार की गई थी। जब समिति ने अस्पृश्योत्थान की योजना को निष्प्राण कर दिया तब श्री गांधी विरोध में एक शब्द भी नहीं बोले।

श्री गांधी के पास तिलक स्वराज्य फंड का एक करोड़ 25 लाख रुपया था। श्री गांधी ने उस धनराशि में से अस्पृश्योत्थान के लिए पर्याप्त धन क्यों नहीं निश्चित किया? यह निस्संदेह सच है। श्री गांधी अस्पृश्यों के हितों के संबंध में पूर्णतया अनमनापन रखते थे। उस मनोवृत्ति के लिए श्री गांधी का स्पष्टीकरण बहुत विचित्र है। उन्होंने कहा कि वह स्वराज्य प्राप्ति के आंदोलन की योजना तैयार करने में व्यस्त थे और उसी कारण उन्हें अस्पृश्यों की ओर ध्यान देने का समय नहीं मिला। उन्होंने अपनी सफाई में केवल अपना टालमटोल का रवैया ही नहीं स्पष्ट किया, बल्कि अस्पृश्यों के प्रति अनमनेपन का नैतिक औचित्य प्रस्तुत किया था। उन्होंने इस तर्क का सहारा लिया कि उन्होंने देश के राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अपने को समर्पित किया हुआ माना है और अस्पृश्यों के हित को अलग रखकर कोई गलती नहीं की है, क्योंकि उनके विचार से हाथी के पांव में सबका पांव होता है और यह कि हिंदू स्वयं अंग्रेजों के गुलाम हैं, ऐसी दशा में एक गुलाम दूसरे गुलामों का उद्धार कैसे कर सकता है। दासानुदास और हाथी के पांव में सबका पांव अच्छे मुहावरे हैं। परंतु वे इससे बढ़कर कोई सच नहीं बता सकते कि यदि देश की दौलत बढ़ती है, तो समझा जाता है कि देश के प्रत्येक नागरिक की दौलत बढ़ती है। परंतु हम गांधी जी को एक तत्त्वदर्शी नहीं मानते। हम उनकी गंभीरता का विवेचन कर रहे हैं। क्या हम उस मनुष्य की ईमानदारी को सही मान लें जो अपनी जिम्मेदारियों से हाथ झाड़ कर पल्ला छुड़ा ले और कोई बहाना गढ़ ले? क्या अस्पृश्य विश्वास कर लें कि श्री गांधी उनके हितैषी हैं?

तब अस्पृश्य श्री गांधी को ईमानदार और निष्ठावान कैसे कह सकते हैं जब वे उनके प्रति तथा मुसलमानों और सिखों के प्रति संवैधानिक संरक्षणों के मामले में दोगली नीति अपनाते हों?

श्री गांधी अस्पृश्यों और अन्य अल्पसंख्यकों को संवैधानिक संरक्षण देने पर अपने दोगलेपन का औचित्य समझाने के लिए एक और दलील देते हैं। उनका तर्क है कि मुसलमानों और सिखों की पहचान करने के लिए वे ऐतिहासिक कारणों से विवश हैं। उन्होंने कभी स्पष्ट नहीं किया कि वे कौन से कारण हैं? इसके सिवा वे कुछ नहीं कह सकते कि मुसलमान और सिख शासक जातियां रही हैं। श्री गांधी के ऐसे बचकाना और गैर-प्रजातांत्रिक तर्कों के आगे झुक जाने का कौन बुरा नहीं मानेगा। तब भी वह सीना ठोक कर कह सकते थे कि वह सभी अल्पसंख्यकों के साथ समान व्यवहार करेंगे तथा ऐसे बेतुके और बेकार तर्कों को कोई महत्व नहीं देंगे। प्रश्न यह