10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 278

अस्पृश्य क्या कहते हैं?

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है कि ऐसे तर्क श्री गांधी को अस्पृश्यों की मांगों का विरोध करने से कैसे रोक सकते थे? श्री गांधी ने अपने तर्क में ऐतिहासिक कारणों के अतिरिक्त किन्हीं अन्य कारणों से न बंधे होने का दावा क्यों किया? श्री गांधी ने यह क्यों नहीं सोचा कि यदि मुसलमानों और सिक्खों के बारे में ऐतिहासिक कारण हैं, तो क्या अस्पृश्यों के संदर्भ में नैतिक कारण नहीं हैं? वास्तविकता तो यह है कि ऐतिहासिक कारण का तर्क केवल खोखला तर्क है, जिसे तर्क की संज्ञा नहीं दी जा सकती। यह अस्पृश्यों की मांगें न मानने का एक बहाना मात्र है।

जब श्री गांधी को बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के प्रश्न का सामना करना पड़ता है, तब वह सकते में पड़ जाते हैं। तब वे भूल जाने और आंख मूंद लेने में ही गनीमत समझते हैं। परंतु परिस्थितियां उनका पीछा नहीं छोड़तीं और उन्हें उन समस्याओं पर विचार करना ही पड़ता है। पिछली बार 21 अक्तूबर, 1939 के हरिजन के संपादकीय में फ्फिक्शन ऑफ मेजोरिटीय् विषय पर लिखा गया लेख बचकानापन ही है। उस लेख में श्री गांधी ने उन लोगों की खिल्ली उड़ाने में कोई कसर नहीं की, जो लगातार उस प्रश्न को उठाते रहे हैं। उस लेख में श्री गांधी ने मुसलमानों को अल्पसंख्यक मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने सिक्खों और भारतीय ईसाइयों को भी अल्पसंख्यक मानने से इंकार कर दिया। उनका तर्क है कि तकनीकी दृष्टि से वे इसलिए अल्पसंख्यक नहीं हैं कि उन्हें सताया गया है। वे मात्र संख्या बल में अल्पसंख्यक हैं। इसलिए असल में वे अल्पसंख्यक बिल्कुल नहीं। तब अनुसूचित जातियों के बारे में श्री गांधी का क्या विचार है? क्या वे इंकार कर सकते हैं कि वे अल्पसंख्यक हैं? मैं श्री गांधी के ही शब्दों का हवाला देता हूंः-

फ्मैंने यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है कि भारत में वास्तव में ऐसे

अल्पसंख्यक हैं ही नहीं जिनके अधिकार स्वाधीनता के बाद खतरे में पड़ जाएंगे।

परंतु दलित वर्ग अपवाद है, जो स्वयं अपना हितसाधन नहीं कर सकते।य्

श्री गांधी के इस कथन को मान लेने से कि सही अर्थों में केवल अनुसूचित जातियां ही भारत में अल्पसंख्यक हैं, जो भारत के स्वतंत्र न होने देने पर सांप्रदायिक हिंदू बहुमत के शासन में अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती। अपनी अंतरात्मा की इस आवाज के बावजूद श्री गांधी इस बात पर अड़े रहे कि वे अस्पृश्यों के लिए संवैधानिक संरक्षणों की बात नहीं मानेंगे। ऐसे व्यक्ति को अस्पृश्य गंभीर और ईमानदार कैसे मान सकते हैं?

श्री गांधी ने गोलमेज सम्मेलन में अस्पृश्यों के राजनीतिक संरक्षण के अधिकारों का डटकर विरोध किया था। उन्होंने अस्पृश्यों की आकांक्षाओं पर पानी फेरने में कोई कसर