10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 279

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं छोड़ी। उनकी मांगों पर मिट्टठ्ठी डालने के लिए और उन्हें अकेला बियाबान में छोड़ देने के लिए मुसलमानों की चौदह मांगें मान कर सौदेबाजी का कुचक्र चलाया। श्री गांधी ने अल्पसंख्यक समिति की बैठक में कहा था - फ्यदि वह अस्पृश्यों की मांगों पर स्वीकृति प्रदान कर देती है, तो विरोध करने वाला मैं कौन होता हूं?य् यह श्री गांधी की बड़ी गलती थी कि उन्होंने समिति के निर्णय का उल्लंघन करने का प्रयत्न किया और अस्पृश्यों की मांग का विरोध करने के लिए श्री जिन्ना द्वारा मुसलमानों के लिए पेश की हुई चौदह सूत्री मांग को ज्यों का त्यों मानते हुए मुसलमानों को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास किया। यह उनकी रणनीति का एक अंग था। उन्होंने मुसलमानों को अपने पक्ष में किया। मुसलमानों की 14 सूत्री मांग के विषय में उन्होंने अस्पृश्यों की मांग का समर्थन वापस ले लेने के टेढ़े प्रश्न को उनके सामने रख दिया कि या तो वे अस्पृश्यों की मांग नामंजूर करें अथवा अस्पृश्यों का पक्ष लेकर अपनी 14 सूत्री मांग से हाथ धोएं। अंत में श्री गांधी की रणनीति मात खा गई। मुसलमानों ने 14 सूत्री मांगें भी मनवा लीं और अस्पृश्यों के मामले में पाला बदला। परंतु यह कांड श्री गांधी के विश्वासघात का प्रमाण बन कर रह गया। उस मनुष्य के चरित्र का दर्पण और क्या हो सकता है, जो दूसरे लोगों के साथ आपराधिक दुरभिसंधि करे और अपने वायदे से मुकर जाए। कौन उसे अपना मित्र कहेगा? ऐसा मित्र जिसके मुंह में राम और बगल में छुरी हो। ऐसे मनुष्य को अछूत कैसे ईमानदार और निष्कपट मान सकते हैं?

श्री गांधी ने सांप्रदायिक प्रश्न का निपटारा करने के लिए पंचफैसले के तौर पर मामला ब्रिटिश प्रधानमंत्री पर छोड़ दिया। अस्पृश्यों की मांगों का श्री गांधी द्वारा विरोध करने पर भी ब्रिटिश सरकार ने अस्पृश्यों के राजनीतिक संरक्षण की मांग मान ली। उस पंचाट में एक पक्ष होने के कारण श्री गांधी फैसला मानने के लिए बाध्य थे। परंतु फिर भी श्री गांधी ने उस फैसले को पलीता लगाने की ठान ली और आमरण अनशन की घोषणा से दुनियां और देश को हिला दिया। उस अनशन का मुख्य उद्देश्य था, अस्पृश्यों को दिए गए संवैधानिक संरक्षण की स्वीकृति वापस लेने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालना। श्री गांधी के पिछलग्गुओं में से एक ने उसे युगांतकारी अनशन कहा है। पता नहीं यह युगांतकारी कैसे था? यह कोई वीरता का काम नहीं था, बल्कि वीरता के विपरीत प्रयास था। उस आंदोलन का आरंभ गांधी जी ने इसलिए किया था कि उन्हें विश्वास था कि अस्पृश्य और ब्रिटिश सरकार दोनों उस आमरण अनशन की धमकी के सामने कांप उठेंगे और उनकी जिद के सामने हथियार डाल देंगे। अस्पृश्य और ब्रिटिश सरकार उनकी भभकी में आकर पीछे हटने को तैयार हो गए और हट भी गए। जब श्री गांधी को समझ में आया कि उन्होंने