10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 281

266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की समस्या सामाजिक समस्या है। लेकिन अस्पृश्य श्री गांधी को कैसे अपना मित्र मान सकते हैं, जो जातियों को कायम रखना चाहते हैं और अस्पृश्यता समाप्त करना चाहते हैं, क्योंकि यह बात साफ है कि अस्पृश्यता केवल जातियों का फलितार्थ है और इसीलिए जातियों को समाप्त किए बिना अस्पृश्यता समाप्त करने की कैसे आशा की जा सकती है? ऐसा हो सकता है कि श्री गांधी ईमानदारी से सोचते हों कि छूतछात की समस्या सामाजिक प्रक्रियाओं से हल की जा सकती है। परंतु अस्पृश्य उस मनुष्य को अपना मित्र कैसे मान सकते हैं, जो हठधर्मी हो और जी जान से उस राजनीतिक प्रक्रिया के विरोध में जुटा हो, जिसके बारे में और सभी लोग सहमत हैं कि राजनीतिक प्रक्रिया से सामाजिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और इससे उस समस्या को हल करने में सहायता ही मिलेगी? उस मनुष्य को अस्पृश्यों को मित्र कैसे माना जाना जा सकता है, जो देश में अस्पृश्यों को राजसत्ता के ऊंचे पदों पर पहुंचने देने में विश्वास नहीं रखता? राजनीतिक संरक्षणों के इस विवाद पर श्री गांधी को निम्नलिखित मांगों में से कोई एक मांग को चुनना चाहिए था। वह अस्पृश्यों के हितैषी बन सकते थे। ऐसा होने पर वह केवल अस्पृश्यों की मांगों का समर्थन ही न करते, वरन् अस्पृश्यों की ओर से मांग उठाने से पहले ही अपने आप उन मांगों का प्रस्ताव लाते और उनके लिए संघर्ष करते। क्योंकि अस्पृश्यों के लिए लड़ने वाला व्यक्ति, उन्हें इस खुशी से बढ़कर क्या दे सकता था कि अस्पृश्यों के लिए ऐसे प्रावधान करा दिए जाते, जिससे उनके सदस्य विधानमंडल में पहुंचते, मंत्रिमंडल में मंत्री होते और ऊंचे-ऊंचे पदों पर होते? निश्चय ही यदि श्री गांधी अस्पृश्यों के लिए लड़ने वाले योद्धा होते, तो इन सुविधाओं के लिए अवश्य लड़ते। दूसरे यह कि यदि वह अस्पृश्यों के नेता नहीं होना चाहते, तो कम से कम उनकी मांगों का समर्थन करने वाले सहयोगी तो हो ही सकते थे, उनको नैतिक और आर्थिक मदद तो दे ही सकते थे। तीसरा यह कि यदि श्री गांधी अस्पृश्यों के अगुआ और संगी साथी भी न बनते, तो दूसरी बात, जो वह कर सकते थे, वह यह थी कि अस्पृश्यों के प्रति अति प्रचारित सहानुभूति में अपनी घोषणाओं पर ही टिके रहते, तो भी अस्पृश्यों के मित्र माने जा सकते थे। फिर एक मित्र के नाते, उन्हें शुभचिंतक और निष्पक्षता का रुख अपनाना चाहिए था। अस्पृश्यों की संरक्षण की मांगों को मनवाने में बाधक न बन कर, उन्हें पूरी सहायता करनी चाहिए थी। यदि वह शुभचिंतक एवं निष्पक्ष रुख नहीं अपना सकते थे, तो शुद्ध निष्पक्षता का रुख अपनाते और अस्पृश्यों से कहते कि यदि गोलमेज सम्मेलन अस्पृश्यों को राजनीतिक संरक्षण प्रदान करने के लिए तैयार हो, तो उन्हें वे मिल जाए। श्री गांधी इस कार्य में न उनकी सहायता करते और न ही रोड़ा अटकाते। इन मर्यादायुक्त विचारों को ताक पर रख कर श्री गांधी अस्पृश्यों