अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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के दुश्मन बनकर उतर आए तब ऐसी दशा में अस्पृश्य श्री गांधी को अपना मित्र एवं सहयोगी कैसे मान सकते हैं?
IV
श्री गांधी का वह अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन असफल रहा। यहां तक कि कांग्रेसी अभिलेखों में भी यही बात स्वीकार की गई है। उनमें से मैं कुछ का उद्धरण दे रहा हूंः- 17 अगस्त, 1939 को बम्बई विधानसभा में अनुसूचित जाति के सदस्य, श्री बी.के. गायकवाड़ ने प्रश्न किया कि बम्बई प्रसीडेंसी में 1932 से जब से श्री गांधी ने मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया है अब तक अस्पृश्यों के लिए मंदिर खोले गए हैं। कांग्रेसी मंत्री द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार खोले गए मंदिरों की संख्या 142 थी। उनमें से बिना स्वामित्व के 121 मंदिर थे, जो रास्ते में बने थे, जिनकी देखभाल कोई नहीं करता था और जिनमें कभी कोई भी आदमी पूजा करने के लिए नहीं जाता था। दूसरा तथ्य सामने आया कि गुजरात में श्री गांधी के अपने जिले में केवल एक मंदिर अस्पृश्यों के लिए खोला गया था।
गांधी जी के 10 मार्च, 1940 के गुजराती समाचार पत्र फ्हरिजन बंधुय् में कहा गयाःµ
फ्अस्पृश्यों के पाठशालाओं में प्रवेश पाने के संबंध में अभी भी अस्पृश्यता
जितनी बाधक गुजरात में है उतनी और कहीं नहीं है।य् ख्1,
बम्बई क्रानिकल ने 27 अगस्त, 1940 के अपने अंक में हरिजन सेवक संघ के मासिक पत्र से एक अंश उद्धृत किया था जो इस प्रकार हैःµ
फ्अहमदाबाद जिले में गोधावी के हरिजनों की और उनके बच्चों को स्थानीय
बोर्ड के स्कूल में पढ़ने के लिए भेजने पर, उन्हें सवर्ण हिंदुओं द्वारा इतना
सताया गया था कि 42 हरिजन परिवारों ने अन्ततः उस स्थान को ही छोड़
दिया और वे सानन्द के तालुक में चले गए।य्
27 अगस्त, 1943 को बम्बई प्रेसीडेंसी में थाना में रहने वाले अस्पृश्य नेता श्री एम.एम. नंदगावकर, जो थाना नगरपालिका के उपाध्यक्ष रह चुके थे, को एक हिंदू होटल में चाय नहीं पिलाई गई। बम्बे क्रानिकल ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए अपने दिनांक 28 अगस्त, 1943 के अंक में लिखाःµ
फ्श्री गांधी ने 1932 में जब अनशन किया था, उस समय अस्पृश्यों के लिए
मंदिर और होटल खोलने के लिए ताबड़तोड़ प्रयत्न होते थे। अब मंदिर प्रवेश
- संजना के ‘सेंस एंड नॉनसेंस इन पॉलिटिक्स’ से उद्धृत।