268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और होटल प्रवेश के संबंध में हालत पहले जैसी हो गई है। सब तरह से
स्वच्छ हरिजन भी मंदिर तथा होटल में प्रवेश नहीं पा सकता। तब भी बहुत
से अस्पृश्यता विरोधी कार्यकर्ताओं ने इन बुराइयों के विषय में कड़ा रुख न
अपनाते हुए कहा है कि उन्हें ऊंचा उठाया जाए, हरिजनों को साफ रहना
सिखाया जाए, तब उनकी सार्वजनिक कठिनाइयां स्वतः समाप्त हो जाएंगी।य्
जनवरी 1944 में कानपुर में अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की कार्यवाही पर बॉम्बे क्रानिकल ने 4 फरवरी, 1944 को अपने अंक में लिखाःµ
फ्हिंदू समाज इतना बेजान है कि अस्पृश्यता और सवर्ण दोनों आज भी एक
साथ फल-फूल रहे हैं। कुछ अंग्रेजों का मिथ्या प्रचार है कि जात-पांत में
जरूरत कोई जादूमंतर है कि हिंदू संस्कृति आज भी जीती जागती है। कुछ
अन्य तर्क देते हैं। कि सदियों से तमाम झकझोरों के बावजूद जातियों का
अस्तित्व न बचता जानकर दुःख होता है कि श्री गांधी तथा अन्य सुधारकों
ने काफी काम किया है, परंतु अस्पृश्यता टस से मस नहीं हुई। गांवों की
कौन कहे बम्बई जैसे शहरों में झाडू लगाने वाले भंगी चाहे जितने साफ
वस्त्र पहन कर निकलें सवर्ण हिंदू होटलों में तो कौन कहे ईरानी होटलों में
चाय तक नहीं पी सकते।य्
अस्पृश्यों ने सदैव यह बात कही है कि श्री गांधी का अस्पृश्यता-विरोधी अभियान असफल हो गया है। पच्चीस वर्षों की मेहनत के बाद भी अस्पृश्यों के लिए होटल बंद हैं, कुएं बंद हैं, मंदिर बंद हैं और देश के अधिकांश भागों में मुख्यतया गुजरात में - उनके लिए स्कूल भी बंद हैं। समाचारपत्रों से जो उद्धरण दिए गए हैं वे स्वागत योग्य सबूत हैं, विशेष रूप से उन समाचार पत्रों से जो कांग्रेस द्वारा संचालित किए जाते हैं। क्योंकि समाचार पत्र उन्हीं बातों की पुष्टि कर रहे हैं, जो अस्पृश्य इस विषय में कहते आ रहे हैं। आगे और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं केवल एक प्रश्न पूछना है।
श्री गांधी उस अभियान में क्यों असफल रहे? मेरे विचार में उनकी असफलता के तीन कारण हैं।
पहला कारण तो यह है कि वे हिंदू जिन्हें श्री गांधी अस्पृश्यता निवारण की अपील कहते हैं उनकी अपीलों को अनसुनी कर देते हैं। ऐसा क्यों होता है? यह शाश्वत सत्य है कि मनुष्य की कथनी और करनी में अंतर होता है। ऐसे कथन के फलस्वरूप जो प्रभाव पड़ता है, दोनों समान नहीं होते। ऐसी बातों का क्षणिक प्रभाव होता है, फिर वह घटते-घटते लुप्त हो जाता है। श्रोता उसे किसी भाव से भी क्यों न सुन रहा हो वह वक्ता के विषय में तदनुसार अपनी धारणा बनाता है, उससे यह बात समझने में मार्ग