अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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प्रशस्त हो जाता है कि श्री गांधी के अस्पृश्यों के प्रति दिए गए उपदेश हिंदुओं को प्रभावित क्यों नहीं कर सके? लोग कुछ देर उनकी प्रार्थना सभा में उपदेश सुनने के बाद मनोविनोद स्थल पर क्यों चले जाते हैं और उनके उपदेशों पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं करते? यह सारा दोष हिंदू जनता का नहीं है। दोष अपने आप में श्री गांधी का है। श्री गांधी ने अपने आपको राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाने वाला महात्मा बताकर
ख्याति अर्जित की है, न कि आध्यात्मिक धर्मगुरु की। इसके पीछे उनके जो भी इरादे हों लेकिन श्री गांधी स्वराज्य के प्रचारक के रूप में देखे जाते हैं। यही कारण है कि हिंदू श्री गांधी के राजनीतिक उपदेश को भलीभांति हृदयंगम करते हैं, परंतु उनके सामाजिक अथवा धार्मिक उपदेशों को नहीं। इसलिए उनके अस्पृश्यता विरोधी अभियान के संबंध में दिए गए उपदेश व्यर्थ जाते हैं। श्री गांधी केवल गांधीवादी राजनीतिक कारीगर हैं। इसीलिए उन्हें अपने राजनीतिक उपदेश तक ही चिपके रहना चाहिए। उन्होंने सोचा था कि वह सामाजिक प्रश्नों का हल निकाल सकते हैं। यह उनकी भूल थी। एक राजनीतिज्ञ उस काम को नहीं कर पाएगा। इसलिए अस्पृश्य श्री गांधी से क्यों आशा करते हैं कि गांधी जी के उपदेशों से उन्हें कोई लाभ होगा?
दूसरा कारण है कि गांधी हिंदुओं से विरोध नहीं लेना चाहते, चाहे वह विरोध अस्पृश्यता विरोधी अभियान चलाने के लिए नितांत आवश्यक क्यों न हो। कुछ दृष्टांतों से श्री गांधी की मनोवृत्ति स्पष्ट हो जाती है।
श्री गांधी के बहुत से मित्र श्री गांधी को अस्पृश्यों के हितों के प्रति उनकी ईमानदारी और गंभीरता के लिए श्रेय देते हैं और आशा करते हैं कि अस्पृश्य उनमें केवल इस आधार पर विश्वास करें कि श्री गांधी ऐसे मनुष्य हैं, जो अस्पृश्यता निवारण की आवश्यकता पर हिंदुओं को धर्मोपदेश दिया करते हैं। वे कबीर के दोहे की अनदेखी कर देते हैं कि फ्पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।य् और उन्होंने श्री गांधी से कभी भी यह नहीं कहा कि वे अस्पृश्यता निवारण की आवश्यकता पर हिंदुओं को धर्मोपदेश देना बंद करें और अस्पृश्यता निवारण के लिए सत्याग्रह अभियान चलाएं और अनशन करें। यदि वे श्री गांधी से इस विषय में स्पष्टीकरण मांगें, तो उन्हें मालूम होगा कि श्री गांधी केवल अस्पृश्यता पर धर्मोपदेश देकर आत्मµसंतुष्टि क्यों कर लेते हैं।
श्री गांधी धर्मोपदेश के अतिरिक्त कुछ नहीं करेंगे, इसके सही कारण अस्पृश्यों की जानकारी में सबसे पहले 1929 में उस समय आएऽ ख्1,, जब 1929 में अस्पृश्यों ने बम्बई प्रेसीडेंसी में अपने नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए मंदिर प्रवेश एवं सार्वजनिक
- जब 1924 में वैकोम में एक सत्याग्रह हुआ था जिसका उद्देश्य था ट्रावनकोर में अस्पृश्यों के प्रयोग के
लिए सार्वजनिक मार्ग का खुलवाना, श्री गांधी ने उन सत्याग्रहियों के लिए सिक्खों द्वारा खोले गए लंगर
का विरोध किया। श्री गांधी द्वारा इसका बताया गया कारण स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं किया गया।