अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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उनके बच्चे दूध के लिए तरसते थे। यही नहीं, एक हरिजन नेता को महादेव की कसम खाने के लिए विवश किया गया कि वह और उसके दूसरे साथी अपने बच्चों को स्कूल भेजने के कोई प्रयत्न नहीं करेंगे। इस प्रकार मामला तय हुआ।
फ्परंतु 10 तारीख को उस जाली समझौते की खबर के बाद भी और गरीब हरिजनों के पूर्णतया आत्मसमर्पण करने पर 19 तारीख तक सामाजिक बहिष्कार वापस नहीं लिया गया था और आंशिक रूप से जुलाहों पर 22 तारीख तक लागू रहा। यह बहिष्कार चमारों पर से थोड़ा पहले उठा लिया गया क्योंकि गरसिया अपने मुर्दा जानवरों को स्वयं नहीं हटा सकते थे और इसलिए उन्होंने चमारों से पहले समझौता कर लिया। इतने ही अत्याचारों से इति नहीं हो गई, वरन् हरिजनों के कुओं में 15 तारीख को और फिर 19 तारीख को मिट्टठ्ठी का तेल उढ़ेल दिया गया। कोई भी कल्पना कर सकता है कि बेचारे हरिजनों पर कैसे भयानक अत्याचार किए गए, क्योंकि उन्होंने गरासिया शहजादों के साथ अपने बच्चों को उस स्कूल में पढ़ाने की हिम्मत की थी। मैं 22 तारीख को प्रातः गरासियाओं से मिला। उन्होंने कहा कि वे उस बात को कभी नहीं बर्दाश्त कर सकते कि स्कूल में ढेड़ों और चमारों के बच्चे उनके बच्चों के साथ बैठें। मैं 23 तारीख को अहमदाबाद के जिलाधीश से उस आशय से मिला कि ऐसी स्थिति समाप्त करने के लिए कोई रास्ता निकल आए, परंतु कोई परिणाम नहीं निकला।
फ्हरिजन बच्चे इस प्रकार गांव के स्कूल में पढ़ने से वंचित कर दिए गए, परंतु किसी ने उनकी सहायता नहीं की। इस निराशा में हरिजनों को इतना विवश कर दिया कि वे सबके सब दूसरे गांव छोड़ देने की सोच रहे हैं।य्
यह खबर श्री गांधी को दी गई थी। श्री गांधी ने क्या किया? श्री गांधी ने कविता गांव के अस्पृश्यों को निम्नलिखित सलाह दी ख्1, ःµ
फ्आत्म-सहायता के बराबर कोई सहायता नहीं। ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। यदि सम्बन्धित हरिजन कविता की भूमि त्यागने के अपने कथित संकल्प को पूरा करेंगे तो वे न केवल स्वयं प्रसन्न होंगे बल्कि उनका भी मार्ग प्रशस्त करेंगे जिन्हें इस प्रकार का
- हरिजन, 5 अक्तूबर, 1935