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अस्पृश्य क्या कहते हैं?

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कहने की यहां कोई आवश्यकता नहीं। इतना कथानक कहने का उद्देश्य केवल इतना है कि वास्तविक लक्ष्य सदैव एक सा नहीं होता, जैसा कि प्रत्यक्ष उद्देश्य होता है और एक धाय भी हत्यारिन हो सकती है। संघ अस्पृश्यों के लिए वहीं है, जो पूतना कृष्ण के लिए बनी थी। संघ अस्पृश्यों को सेवा के बहाने अस्पृश्यों के दिमाग से स्वतंत्रता की भावना को समाप्त कर देना चाहता है। अस्पृश्यों ने अपने आंदोलन के आरंभ में कुछ उदार हिंदू नेताओं का मार्गदर्शन प्राप्त किया था। गोलमेज सम्मेलन के समय से अस्पृश्य पूर्णतया आत्म-विश्वासी होकर स्वतंत्र रूप से संगठित होने लगे। उन्होंने हिंदुओं की उदारता पर निर्भर न रहकर अपनी जो मांगें पेश की थीं वे उनके अधिकार थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री गांधी द्वारा हरिजन सेवक संघ की स्थापना का उद्देश्य अस्पृश्यों की स्वतंत्रता की भावना को समाप्त कर देना था। हरिजन सेवक संघ ने छोटी-मोटी सेवाएं करके ऐसे कृतज्ञ अस्पृश्यों का झुंड इकट्टòा कर लिया था जिनसे यही प्रचार करने का काम किया जाता था कि श्री गांधी और हिंदू ही अस्पृश्यों के संरक्षक हैं। आइरिश लीडर डेनियल ओकोनेल ने एक बार कहा था कि कोई भी स्त्री अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती। अस्पृश्य समझते हैं कि श्री गांधी द्वारा हरिजन सेवक संघ की स्थापना अस्पृश्यों की स्वतंत्रता चेतना को समाप्त करने के लिए की गई है जो कुछ श्री गांधी चाहते थे, वही संघ ने किया।

हरिजन सेवक संघ ने सबसे बड़ी हानि अस्पृश्य विद्यार्थियों को ऐसे छात्रावासों में रखकर पहुंचाई, जो संघ द्वारा संचालित थे। उन अस्प्ृश्य विद्यार्थियों पर विचार करते समय हमें महाभारत के दो महत्वपूर्ण पुरुषों की याद आ जाती है। भीष्म ने बड़े जोर शोर के साथ घोषणा कर दी कि पांडवों का पक्ष सही है और कौरवों का पक्ष गलत। परंतु जब दोनों दलों में युद्ध का समय आया तब भीष्म पांडवों के विरुद्ध कौरवों की ओर से लड़े। जब उनसे इस प्रकार कौरवों का पक्ष लेने का कारण उचित सिद्ध करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने निर्लज्जता से कह दिया कि उन्होंने कौरवों का नमक

खाया है। देवासुर संग्राम में कच देवताओं का पक्षधर था। राक्षसों को संजीवनी मंत्र मालूम था, जिससे वे अपने मृत राक्षसों को जीवित कर लेते थे। देवताओं को यह मंत्र मालूम नहीं था। इसलिए वे देवताओं को जीवित न कर सकने के कारण युद्ध में पराजित हो रहे थे। देवों ने कच को राक्षसों के गुरु के पास इस निर्देश के साथ भेजा कि वह उनसे किसी प्रकार उस मंत्र को सीख कर शीघ्र वापस आ जाए। आरंभ में कच असफल रहा। अंत में वह राक्षसों के आध्यात्मिक पुरोहित गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को अपने प्रेम जाल मे फंसा कर उससे विवाह करने के लिए इस शर्त पर सहमत हो गया कि देवयानी उस मंत्र को सीखने में कच की सहायता करे। देवयानी ने अपनी शर्त पूरी कर दी। परंतु कच ने मंत्र प्राप्ति के पश्चात् देवयानी से