10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 289

274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विवाह करने की शर्त तोड़ दी और वह यह कह कर कि विवाह की शर्त से बढ़कर उसकी जाति का हित है, रफूचक्कर हो गया।

मेरे विचार में भीष्म और कच दोनों अजीब नैतिक दुश्चरित्रता के शिकार थे जो कुछ समय के लिए स्वार्थ साधन करने के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते थे। इसी प्रकार हरिजन सेवक संघ द्वारा संचालित छात्रावासों में रहने वाले छात्र भीष्म और कच की भूमिका निभा कर श्री गांधी और कांग्रेस की प्रशंसा के गीत गा रहे हैं। जब वे छात्रावासों से बाहर आते हैं, तब वे कच की भूमिका निभाते हैं और श्री गांधी तथा कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार करते हैं। यह देखकर मुझे बहुत दुःख होता है कि अस्पृश्य नवयुवकों के लिए इस प्रकार के चारित्रिक पतन से अधिक बुरा हो क्या हो सकता है। यह श्री गांधी के हरिजन सेवक संघ द्वारा अस्पृश्यों के साथ किया गया सबसे बड़ा अपराध है। इससे उन अस्पृश्यों के चरित्र का पतन किया गया। इससे उनकी स्वतंत्र भावना को नष्ट किया गया है। यह यही हुआ जो श्री गांधी चाहते थे।

चौथा उदाहरण लीजिए। हरिजन सेवक संघ सवर्ण हिंदुओं द्वारा संचालित किया जाता है। कुछ अस्पृश्यों ने यह मांग की कि संघ अस्पृश्यों को सौंप दिया जाए और उसका संचालन अस्पृश्य स्वयं करें। कुछ अन्य अस्पृश्यों ने मांग की, कि संघ के मुख्य संचालक बोर्ड में अस्पृश्यों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। श्री गांधी ने उन दोनों मांगों पर टका सा जवाब दे दिया, जो बड़े से बड़ा धूर्त व्यक्ति भी नहीं कर सकता। श्री गांधी का पहला तर्क यह था कि हरिजन सेवक संघ हिंदुओं द्वारा अस्पृश्यता बरतने के पाप का प्रायश्चित करने का माध्यम है। हिंदुओं को अपने किए पर अवश्य प्रायश्चित करना है। इसीलिए अस्पृश्यों को संघ के संचालन में कोई स्थान नहीं मिल सकता। दूसरा तर्क यह है कि एकत्र किया गया धन हिंदुओं से प्राप्त हुआ है, अस्पृश्यों से नहीं और क्योंकि वह धन अस्पृश्यों से प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए अस्पृश्य संघ के संचालन बोर्ड के प्रतिनिधि नहीं बन सकते। श्री गांधी की अस्वीकृति बर्दाश्त की जा सकती है, परंतु उनके द्वारा दिए गए तर्क इतने अपमानजनक हैं कि कोई भी स्वाभिमानी इस संघ से वास्ता रखने से इंकार कर देगा। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि हरिजन सेवक संघ एक न्यास के समान है और अस्पृश्य उस संस्था से लाभ प्राप्त करता है। इस संबंध में कानून और प्राकृतिक न्याय को जानने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि सभी लाभप्राप्तकर्ताओं को उस न्यास के उद्देश्य और लक्ष्य जानने का पूरा अधिकार है और उन्हें यह भी जानने का अधिकार है कि धन के उपयोग के विषय में कोई अनियमितताएं तो नहीं बरती जा रही हैं। लाभार्थियों को यह भी अधिकार है कि विश्वास खो जाने पर न्यासी को हटा सकते