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अस्पृश्य क्या कहते हैं?

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हैं। उस आधार पर संघ की प्रबंधकारिणी समिति में अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व के अधिकार को अस्वीकार करना असंभव हो जाएगा। श्री गांधी इस स्थिति में भी कोई बात मानने को तैयार नहीं थे। एक आत्म-स्वाभिमानी अस्पृश्य इसमें स्थान पाने के लिए गिड़गिड़ाना पसंद नहीं करेगा और जो श्री गांधी की दान-दक्षिणा पर अस्पृश्यों के भविष्य को न छोड़ने पर विश्वास रखता है उसे श्री गांधी से झगड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वह स्वाभिमानी अस्पृश्य यह कहने के लिए बिल्कुल तैयार है कि यदि नीचता आभूषण है, तब श्री गांधी का तर्क लाजवाब है। यह आभूषण श्री गांधी को मुबारक हो। तब यदि अस्पृश्य संघ का बहिष्कार करते हैं, तो श्री गांधी को पतंगे नहीं लगने चाहिएं।

हरिजन सेवक संघ को संचालित करने में अस्पृश्यों को भाग न लेने देने के यही वास्तविक कारण नहीं हैं। वास्तविक कारण तो इससे भिन्न हैं। पहला तो यह कि यदि संघ अस्पृश्यों को सौंप दिया जाए, तो श्री गांधी और कांग्रेस के पास अस्पृश्यों पर उल्लू की लकड़ी फिराने का और कोई साधन नहीं रह जाएगा। अस्पृश्य हिंदुओं की कृपा पर निर्भर रहना बंद कर देंगे। दूसरी बात यह कि अस्पृश्य स्व्तंत्र हो जाने पर अपने कल्याण के लिए हिंदुओं पर कृतज्ञता जताना बंद कर देंगे। ये ऐसे कारण हैं, जो श्री गांधी द्वारा हरिजन सेवक संघ की स्थापना के उनके सर्वोच्च उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत हैं। श्री गांधी ईसाइयों जैसी मिशन कंपाउंड की भावना अस्पृश्यों में पैदा करना चाहते हैं। सही कारण है कि श्री गांधी हरिज सेवक संघ के नियंत्रण और प्रबंध में अस्पृश्यों को सम्मिलित नहीं होने देना चाहते। क्या यह अस्पृश्यों के उत्थान की इच्छा के अनुकूल है? क्या श्री गांधी अस्पृश्यों को स्वतंत्रता दिलाने वाले कहे जा सकते हैं? क्या श्री गांधी अस्पृश्यों के मुक्तिदाता कहे जा सकते हैं? क्या श्री गांधी की इस करतूत से स्पष्ट नहीं है कि अस्पृश्यों को हिंदुओं की दासता से मुक्त करने के बजाए, उन्हें अधिक बड़े शिकंजे में कसना चाहते हैं। यही कारण है कि श्री गांधी का अस्पृश्यता निवारण अभियान असफल रहा।

V

अंत में सब मिलाकर, क्या यह कहा जा सकता है कि क्या श्री गांधी अस्पृश्यों के छीने हुए मानव अधिकार उन्हें पुनः वापस दिला सकते हैं? उत्तर स्पष्ट है कि नहीं। वे सभी अधिकार हिंदुओं के पास हैं। श्री गांधी ने उन अधिकारों को अस्पृश्यों को दिलाने के लिए कुछ भी नहीं किया और न उन अधिकारों की प्राप्ति करने में उन्होंने अस्पृश्यों की कोई सहायता की। उल्टे श्री गांधी ने अस्पृश्यों के मार्ग में सदैव रोड़ा अटकाया। अस्पृश्य अनुभव करते हैं कि हिंदुओं की दासता से मुक्ति पाने के उनके मानवता के अधिकार राजनीतिक सत्ता के अतिरिक्त और किसी प्रकार प्राप्त