1. अनोखी घटना - Page 29

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि 1895 से पूर्व कांग्रेसजनों में सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक सुधार के मुद्दे पर दो विचारधाराएं थीं। एक विचारधारा के समर्थक थे श्री दादाभाई नौरोजी, श्री बदरुद्दीन तैयब जी और श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी। दूसरी विचारधारा थी श्री डब्ल्यू.सी. बनर्जी की। पहली विचारधारा के समर्थक सामाजिक सुधार की आवश्यकता तो मानते थे, परन्तु उनका विचार था कि इसके लिए कांग्रेस अधिवेशन सही मंच नहीं है। दूसरी विचारधारा सामाजिक सुधार की आवश्यकता नहीं समझती थी और उसने इस मत को चुनौती दी कि सामाजिक सुधार के बिना राजनीतिक सुधार नहीं लाया जा सकता। यद्यपि कांग्रेस के अंदर की ये दोनों विचारधाराएं एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत थीं, फिर भी 1895 तक उनमें आपसी प्रतिरोध विकसित नहीं हुआ था। पहली विचारधारा का प्रभुत्व था और परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा सोशल कांफ्रेंस दो समानान्तर संगठनों के रूप में कार्य करते थे और अपने-अपने उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति पर ध्यान देते थे। दोनों के बीच इतना अधिक सहयोग तथा सद्भाव था कि राष्ट्रीय कांग्रेस तथा सोशल कांफ्रेंस के वार्षिक अधिवेशन एक दूसरे के तुरन्त बाद उसी पंडाल में किए जाते थे और जो लोग कांग्रेस अधिवेशन के लिए आते थे उनमें से अधिकतर सोशल कांफ्रेंस में भी उपस्थित होते थे। परन्तु सोशल कांफ्रेंस उन कांग्रेसजनों की आंख की किरकिरी थी जो सामाजिक सुधार-विरोधी मत के थे। यह वर्ग कांग्रेस के उस प्रभुत्वशाली वर्ग के प्रति उद्विग्न हो रहा था। जो सोशल कांफ्रेंस पर मेहरबान थे और उसे अपना अधिवेशन करने के लिए कांग्रेस पंडाल का प्रयोग करने जैसी सुविधाएं देते थे।

वर्ष 1895 में जब कांग्रेस की बैठक पूना में हुई तो सामाजिक-सुधार विरोधी गुट विद्रोह कर बैठा तथा उसने धमकी दी कि यदि कांग्रेस ने सोशल कान्फ्रेंस को अपने पंडाल का उपयोग करने की अनुमति दी तो पंडाल फूंक दिया जाएगा। सोशल कान्फ्रेंस के उन विरोधियों का नेतृत्व सामाजिक अनुदारवादी और राजनीतिक उग्रवादी स्वर्गीय श्री बाल गंगाधर तिलक कर रहे थे जिन्होंने फ्स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार हैय् का नारा दिया था जो कांग्रेस का मूलभूत सिद्धांत माना जाने लगा। कांग्रेस में सोशल रिफार्म पार्टी समर्थक अपने विरोधियों ख्1, से संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं थे इसीलिए विद्रोह काफी सीमा तक सफल हो गया। विद्रोह का एक प्रभाव यह पड़ा कि उससे

  1. कांग्रेस में सोशल रिफार्म पार्टी के समर्थकों ने उस चुनौती को स्वीकार नहीं किया। यह बात श्री सुरेन्द्र

नाथ बनर्जी के उस पत्र से सिद्ध हो जाती है जो उन्होंने सोशल कान्फ्रेंस द्वारा कांग्रेस पंडाल का उपयोग

करने के संबंध में तिलक की पार्टी द्वारा उठाए गए प्रश्न के बारे में श्री रानाडे को लिखा था जिसमें

उन्होंने कहा था कि अपने कार्य क्षेत्र में सामाजिक प्रश्नों को निकालने का मुख्य अभिप्राय यह है कि

ऐसे प्रश्नों को लेने से हम लोगों में बड़े मतभेद पैदा हो सकते हैं और अंततः फूट पड़ जाएगी और

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें विघटन को रोकना है। दूसरे पक्ष का अनुरोध बिल्कुल अनुचित

है। लेकिन कभी हमें अपेक्षाकृत बुराइयों को टालने के लिए अनुचित मांगें भी माननी पड़ती हैं।