10. अस्पृश्य क्या कहते हैं? - Page 291

276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं हो सकते। दूसरी ओर, श्री गांधी का कहना है कि उनके उपदेश और उनकी उदारता तथा हिंदुओं का उत्साह ही अस्पृश्यों की सभी कठिनाइयों को दूर करने का सबसे बड़ा उपाय है। क्या अस्पृश्य हिंदुओं की अनुकंपा और उनके उत्साह पर विश्वास कर सकते हैं? उनकी अनुकंपा पर विचार करना चाहिए, जो एक उन्माद है और प्रतिशोध का संगम है। परंतु अस्पृश्यों का कौन मित्र है, जो उनसे कह सकता है कि हिंदुओं की उस दयनीय अनुकंपा और उत्साह में वे विश्वास कर उन पर निर्भर करें? जब से पिछले दो हजार वर्षों से अस्पृश्यता अस्तित्व में आई है, सवर्ण हिंदुओं ने दिन प्रति दिन अस्पृश्यों का खून चूसा है। तरह-तरह से उनको विखंडित किया है और पददलित किया है। उन दो हजार वर्षों में हिंदुओं ने अस्पृश्यों पर कब दया दिखाई और उदारता बरती है? केवल आठ लाख हिंदुओं ने वह भी, जब कि श्री गांधी ने व्यक्तिगत रूप से सारे देश का भ्रमण करते हुए दया की भीख मांगी। अपनी योजना को कसौटी पर कसते हुए श्री गांधी यह इच्छा व्यक्त कर सकते थे कि अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकार ही उनकी मुक्ति का एकमात्र उपाय हैं। वास्तव में इस मांग का औचित्य स्पष्ट है कि साधारण सूझबूझ का मनुष्य भी समझ सकता है कि अस्पृश्यों के हाथ में कार्यपालिका की शक्ति आ जाने पर उनके कल्याण का जो काम एक साल में हो सकता है, संन्यासियों के सौ वर्ष के उपदेश भी उसके सामने कुछ नहीं। परंतु अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकारों के विषय में श्री गांधी को वितृष्ण् ा है। तब अस्पृश्य क्यों न कहें फ्गांधी से सावधान रहोय् जब वे यह भली-भांति जानते हैं कि श्री गांधी अस्पृश्योद्धार के लिए राजनीतिक प्रक्रिया को चलने नहीं देंगे, जबकि वह इस वास्तविकता से अवगत हैं कि अस्पृश्यों को सामाजिक प्रक्रिया द्वारा सहायता पहुंचा कर उनका उद्धार करना पूर्णतया निष्फल रहा है।

इस संबंध में अमरीका गृहयुद्ध में संघ और दासता के संबंध में दो प्रश्नों पर राष्ट्रपति लिंकन का आचरण याद आता है। उस आचरण का परिचय श्री होरेस ग्रीले और राष्ट्रपति लिंकन के बीच वर्ष 1862 में जो पत्र-व्यवहार हुआ था उससे मिलता है ख्1, । श्री ग्रीले ने राष्ट्रपति को संबोधित अपने पत्र फ्द प्रेयर ऑफ ट्वेंटी मिलियन्सय् में कहा थाःµ

फ्राष्ट्रपति जी। उस विस्तृत धरती पर अनिच्छुक प्रतिबद्ध बुद्धिवादी व्यक्ति

नहीं है, जो संघ का हितैषी हो और यह न अनुभव करता हो कि विद्रोह को

दबाने के लिए सभी प्रयत्न किए जाएं। साथ-साथ यह भी विचार उठते हैं

कि उत्तेजित करने वाली दासता की बातें अनर्गल और व्यर्थ हैं।य्

इसके उत्तर में लिंकन ने कहाःµ

  1. इब्राहिम लिंकन, वाघ्मय, खंड XI, पृ. Xii, Xiii