अस्पृश्य क्या कहते हैं?
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फ्यदि कुल लोग ऐसे हैं, तो तभी संघ की सुरक्षा करेंगे, जब वे भी दासता
से सुरक्षित रख सकें तो मैं उनसे सहमत नहीं हूं।य्
फ्यदि कुछ लोग ऐसे हैं, जो संघ का बचाव तब तक नहीं करेंगे, जब
तक कि दासता भी समाप्त न की जाए, तो मैं उनसे सहमत नहीं हूं।य्
फ्मेरा सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य संघ को बचाना है, दासता को बचाना या उसे
समाप्त करना नहीं।य्
यदि मैं किसी गुलाम को स्वतंत्र किए बिना संघ की सुरक्षा कर सकता
हूं, तो मैं करूंगा। यदि सभी गुलामों को स्वतंत्र करके ही संघ की सुरक्षा हो
सकती है, तो मैं करूंगा और यदि कुछ गुलामों को स्वतंत्र कर और कुछ
को नहीं, तो मैं उसे भी करूंगा।य्
नीग्रो दासता और संघ के प्रश्न के संबंध में राष्ट्रपति लिंकन के ये विचार थे। उन विचारों से उस व्यक्ति का दूसरा ही चरित्र उभरता है, जिसे नीग्रो लोगों के मुक्तिदाता के रूप में जाना जाता है। वास्तव में यह स्पष्ट रूप से नीग्रो जनता के उद्धार में विश्वास नहीं करते थे। स्पष्ट रूप में जनता की सरकार, जनता द्वारा सरकार और जनता के लिए सरकार के सिद्धांत के रचयिता प्रेसीडेंट लिंकन के लिए यह एतराज करने की बात नहीं होनी चाहिए थी कि काले (नीग्रो) लोगों की सरकार श्वेत (अमरीकंस) लोगों द्वारा और श्वेतों के लिए हो। श्री गांधी की भावना स्वराज्य और अस्पृश्यों के विषय में ठीक वैसी ही है जैसा कि राष्ट्रपति लिंकन की भावना नीग्रो लोगों की स्वतंत्रता के प्रश्न पर और संघ के संबंध में थी। श्री गांधी उसी प्रकार स्वराज्य चाहते थे, जिस प्रकार लिंकन अमरीकी संघ चाहते थे। परंतु श्री गांधी अस्पृश्यों को राजनीतिक अधिकार देकर हिंदू धर्म के ढांचे में किसी प्रकार की दरार उत्पन्न कर हानि पहुंचाने के बदले में स्वराज्य नहीं चाहते थे, जैसा कि राष्ट्रपति लिंकन तब तक नीग्रो को स्वतंत्र नहीं करना चाहते थे, जब तक कि अमरीकी संघ के लिए वैसा करना अनिवार्य न हो। निस्संदेह श्री गांधी और राष्ट्रपति लिंकन के विचारों में यही अंतर था। राष्ट्रपति लिंकन नीग्रो लोगों का उद्धार करने के लिए तैयार हो जाते यदि ऐसा करना संघ को सुरक्षित रखने के लिए वह आवश्यक समझते। श्री गांधी की सोच उससे भिन्न है। श्री गांधी अस्पृश्यों को राजनीतिक विस्तार देने के लिए तैयार नहीं है, चाहे वह स्वराज्य के लिए जरूरी भी हो। श्री गांधी का रुख ऐसा है कि अस्पृश्यों को राजनैतिक अधिकार नहीं मिलने चाहिए बेशक स्वराज्य खतरे में ही क्यों न पड़ जाए।
- हरिजन दिनांक 13 अक्तूबर, 1940