गांधीवाद
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(2) स्वराज्य के बीज वर्ण व्यवस्था में उपलब्ध हैं। विभिन्न जातियां सैनिक डिवीजन की भांति इसके विभिन्न वर्ण हैं। प्रत्येक वर्ण सैनिक डिवीजन की भांति पूरे समाज के हित में काम करता है।
(3) जो समाज वर्ण-व्यवस्था का सृजन कर सकता है, उसे निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उनमें अनोखी संगठन क्षमता है।
(4) वर्ण-व्यवस्था में प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के लिए सदाबहार साधन मौजूद हैं। प्रत्येक जाति अपने बच्चों को अपनी जाति में शिक्षित करने की जिम्मेदारी लेती है। जातियों का राजनीतिक उद्देश्य है। कोई भी जाति अपनी अपनी प्रतिनिधि सभा में अपने प्रतिनिधि चुनकर भेज सकती है। जाति अपने पारस्परिक जातीय झगड़ों को तय करने के लिए पंच चुन कर न्यायिक प्रक्रिया को पूरा कर सकती है। प्रत्येक जाति को सैनिक टुकड़ी का दर्जा देकर सुरक्षा के लिए जबरदस्त सेना तैयार करना जातियों के लिए सरल है।
(5) मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ करने के लिए अंतर्जातीय विवाह अथवा भोज आवश्यक नहीं है। यह कहना कि अंतर्जातीय सहभोज से मित्रता बढ़ेगी अनुभव के ठीक विपरीत है। यदि इसमें सच्चाई होती, तो यूरोप में युद्ध न होते। सहभोज उसी प्रकार गंदा है, जैसे कि मल-मूत्र विसर्जन करना। अंतर इतना है कि मल-मूत्र त्यागने के बाद हमें चैन मिलता है और
खाने के बाद परेशानी अनुभव करते हैं। अतः जिस प्रकार हम शौच से एकांत में निवृत्त होते हैं, उसी प्रकार भोजन भी एकांत में ही करना चाहिए।
(6) भारतवर्ष में भाइयों के बच्चों में पारस्परिक विवाह नहीं होते, क्या पारस्परिक विवाह न करने से उनके प्रेम में कमी आती है? वैष्णवों में बहुत सी महिलाएं इतनी कट्टठ्ठरपंथी हैं कि वे अपने परिवार के लोगों के साथ भोजन नहीं करतीं और न एक ही बर्तन से पानी पीना पसंद करती हैं क्या उनमें पारस्परिक प्रेम नहीं है? जाति-प्रथा को इस कारण बुरा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें विभिन्न जातियों में पारस्परिक भोज एवं पारस्परिक वाह की आज्ञा का निषेध है।
(7) जाति-प्रथा संयम का ही दूसरा नाम है। जाति मनोरंजन पर सीमा निर्धारित करनी है। वह जातीयता की सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकती। भिन्न जातियां रोटी-बेटी के व्यवहार पर पहले से ही जाति बंधन मुक्त हैं।