11. गांधीवाद - Page 299

284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(8) जाति व्यवस्था को नष्ट करके पश्चिमी यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था

अपनाने का अर्थ होगा हिंदू उन पैतृक पेशों को त्याग दें, जो जाति-प्रथा की

आत्मा है। इसे तोड़ने से अव्यवस्था उत्पन्न होगी। यदि मैं अपने जीवन भर

किसी को ब्राह्मण कह कर नहीं पुकारता, तो ब्राह्मण होने में क्या लाभ। यदि

ब्राह्मणों को शूद्रों में और शूद्रों को ब्राह्मणों में परिवर्तित होने का दैनिक क्रम

शुरू हो जाएगा, तो समाज में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी।

(9) जाति-प्रथा एक प्राकृतिक विधान है। भारतवर्ष में उसे धार्मिक रूप

दिया गया है। अन्य देशों में जहां जाति व्यवस्था की उपयोगिता नहीं समझी

गई, वहां की सामाजिक व्यवस्था बिखरी अवस्था में है और इसी कमी के

फलस्वरूप वे जाति व्यवस्था को होने वाले लाभ प्राप्त नहीं कर सकते,

जबकि भारत में वह मौजूद है।

मेरे यही विचार हैं और मैं उनके विरुद्ध हूं जो वर्ण-व्यवस्था को तोड़ना

चाहते हैं।य्

वर्ष 1922 में श्री गांधी वर्ण-व्यवस्था के पक्षधर थे। इसकी जांच करने पर स्पष्ट हो जाता है कि 1925 में वर्ण-व्यवस्था के संबंध में श्री गांधी द्वारा व्यक्त किए गए विचार तीन वर्ष पहले प्रकट किए गए विचारों से कैसे भिन्न हो गए। 3 फरवरी, 1925 को श्री गांधी ने कहा था -

फ्जाति-प्रथा का समर्थन मैंने इस आधार पर किया था कि वह संयम सिखाती

है, परंतु आजकल जाति-प्रथा का अर्थ संयम नहीं, वरन् अब वे सीमाबद्ध

हो गई हैं। संयम अच्छा होता है और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सहायक सिद्ध

होता है। परंतु सीमाबद्ध होना बेडि़यों के समान है। जातियां जिस रूप में आज

हैं, उस रूप में उनकी तारीफ नहीं की जा सकती। आजकल जातियां शास्त्र

विरोधी हो गई हैं। जातियों की संख्या असीम है, जिनमें पारस्परिक विवाह संबंध

के प्रतिबंध लगे हैं। यह उत्थान का लक्षण नहीं, वरन् पतन का मार्ग है।य्

इस प्रश्न के उत्तर में कि इसका क्या समाधान है, श्री गांधी ने कहा -

फ्सर्वोत्तम उपाय यह है कि छोटी-छोटी जातियां अपना अलग अस्तित्व समाप्त

कर बड़ी जाति बन जाएं। ऐसी बड़ी जातियों की संख्या 4 हो जिससे प्राचीन

वर्ण व्यवस्था की पुनर्स्थापना हो सके।य्

संक्षेप में कहा जा सकता है कि वर्ष 1925 में श्री गांधी वर्ण-व्यवस्था के पक्षधर हो गए।