गांधीवाद
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प्राचीन भारत में जो वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, उसने समाज को चार भागों में विभक्त कर रखा था (1) ब्राह्मण, जिसका व्यवसाय था विद्याध्ययन करना, (2) क्षत्रिय, जिसका कार्य था युद्ध करना, (3) वैश्य, जिसका व्यवसाय था व्यापार करना, (4) शूद्र, जिसका व्यवसाय था प्रथम तीन वर्णों की सेवा करना। क्या श्री गांधी की वर्ण व्यवस्था ठीक वैसी ही है, जैसी वर्ण व्यवस्था हठधर्मी हिंदू मानते हैं? श्री गांधी ने अपनी वर्ण व्यवस्था की निम्नलिखित ढंग से व्याख्या की ख्1, -
फ्(1) मैं विश्वास करता हूं कि वर्णों का विभाजन जन्म पर आधारित है।
(2) वर्ण व्यवस्था में कोई ऐसी बात नहीं है, जो शूद्रों को विद्या अध्ययन
अथवा सैनिक युद्ध कला सीखने से वंचित करती हो। इसके विपरीत क्षत्रिय
के सेवा अथवा नौकरी करने पर कोई रोक नहीं है। वर्ण व्यवस्था इस बात
की अनुज्ञा देती है कि शूद्र धनोपार्जन के लिए अध्ययन नहीं करेगा, न
क्षत्रिय ही धनोपार्जन के लिए सेवा कार्य अपनाएगा। इसी प्रकार ब्राह्मण युद्ध
कला सीख सकते हैं, परंतु उसे अपनी जीविका का साधन नहीं बनाएगा।
वैश्य विद्या प्राप्त कर सकता है अथवा युद्ध कला सीख सकता है, परंतु उन्हें
धनोपार्जन का साधन नहीं बना सकता।
(3) वर्ण व्यवस्था जीविकोपार्जन से सम्बद्ध है। इसमें कोई हानि नहीं,
यदि किसी एक वर्ण का आदमी दूसरे वर्ण की कला और व्यवसाय के
विषय में ज्ञान प्राप्त कर उसमें पारंगत हो जाता है। परंतु जहां तक धनोपार्जन
का संबंध है, उसके लिए अपने ही वर्ण का व्यवसाय अपनाना ठीक होगा।
जिसका अर्थ यह होगा कि पीढ़ी दर पीढ़ी से चले आए अपने पैतृक व्यवसाय
को ही अपनाया जाए।
(4) वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य है, प्रतियोगिता और बराबरी करने की प्रवृत्ति
को रोकना तथा वर्ग संघर्ष से बचना। मैं वर्ण व्यवस्था में विश्वास करता हूं,
क्योंकि इससे लोगों के कर्तव्यों और व्यवसायों का निर्धारण होता है।
(5) वर्ण का अर्थ है, मनुष्य के जन्म लेने से पहले उसके व्यवसाय
का निर्धारण।
(6) वर्ण व्यवस्था में किसी मनुष्य को अपनी पसंद का व्यवसाय करने
की स्वतंत्रता नहीं होती। उसका पैतृक व्यवसाय जन्म से ही निर्धारित रहता
है।
- ये अंश श्री गांधी के एक लेख से लिए गए हैं, जो ‘वर्ण व्यवस्था’ नामक पुस्तक में पुनर्मुद्रित किया
गया था। उस पुस्तक में श्री गांधी के मूल गुजराती में लिखे लेख समाविष्ट किए गए हैं।