286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अब उनके अर्थव्यवस्था संबंधी पक्ष पर विचार प्रस्तुत हैं। आर्थिक जीवन के संबंध में उनके दो आदर्श थे -
पहला आदर्श था मशीनों तथा मशीनीकरण का विरोध करना। बहुत पहले ही वर्ष 1921 में श्री गांधी ने मशीनीकरण का विरोध करने का संकेत दिया था। 19 जनवरी, 1931 के फ्यंग इंडियाय् में श्री गांधी ने लिखा -
फ्क्या मैं उन्नति के पथ पर आरूढ़ घड़ी की सुई को पीछे घुमा देना चाहता
हूं? क्या मैं मिलों के स्थान पर अब चर्खा और करघा लाना चाहता हूं?
क्या मैं रेलवे के स्थान पर बैलगाड़ी चलाना चाहता हूं? क्या मैं मशीनों
को पूर्णतया नष्ट कर देना चाहता हूं? इस प्रकार के प्रश्न पत्रकार एवं
जनता के लोग मुझसे पूछते हैं। मेरा उत्तर है कि यदि मशीनें पूर्णतया नष्ट
कर दी जाती हैं, तो मैं इसे कोई परेशानी नहीं समझूंगा और न इसे कोई
संकट मानूंगा।य्
मशीनों के प्रति श्री गांधी का विरोध इससे प्रकट होता है कि वे मशीनों के स्थान पर चरखा लाना चाहते हैं और हाथ से सूत कात कर स्वयं वस्त्र बना कर पहनने के समर्थक हैं। उनका मशीनों से इस प्रकार का विरोध और चरखे के प्रति प्रेम का कारण कोई घटना नहीं है। श्री गांधी ने 8 जनवरी, 1925 को काठियावाड़ की राजनीतिक सभा की अध्यक्षता करते हुए इस दर्शन को अपनाने की प्रतिज्ञा की थी। इस विषय में उन्होंने कहा था -
फ्असीम बढ़ती हुई निर्जीव मशीनों की पूजा करते-करते राष्ट्र थक गए हैं।
हम बेजोड़ मशीन अर्थात् अपने शरीर को निर्जीव मशीनों पर आश्रित बना
कर बरबाद कर रहे हैं। यह प्राकृतिक नियम है कि पूरा काम शरीर से लिया
जाए और इसका सदुपयोग किया जाए। हम इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
चरखा शरीर यज्ञ का शुभ संकेत है। यदि कोई मनुष्य बिना श्रम किए भोजन
करता है, तो वह चोरी करता है। श्रम के इस बलिदान को छोड़ देने से हम
इस प्रकार के देशद्रोही बन जाते हैं और भाग्यवादी बन जाते हैं।य्
जिस किसी ने श्री गांधी की पुस्तक फ्हिन्द स्वराज्यय् का अध्ययन किया है उसे मालूम होगा कि उस पुस्तक के अनुसार श्री गांधी वर्तमान सभ्यता के विरुद्ध हैं। यह पुस्तक सर्वप्रथम 1908 में प्रकाशित हुई थी। परंतु उनकी विचारधारा में कोई परिवर्तन