गांधीवाद
नहीं आया। श्री गांधी ने 1921 में कहा ख्1, -
287
फ्वह पुस्तक आधुनिक सभ्यता की कटु निंदा करती है। यह पुस्तक 1908
में लिखी गई थी। मेरी निष्ठा आज पहले से भी अधिक दृढ़ है। मैं अनुभव
करता हूं कि यदि भारत आधुनिक सभ्यता का परित्याग कर दे, तो उसे
अधिक लाभ मिलेगा।य्
गांधी जी के विचारों में पाश्चात्य सभ्यता शैतान की रचना है। ख्2,
श्री गांधी का दूसरा आदर्श था मालिकों और नौकरों तथा भूस्वामी और असामी के संबंध में वर्ग संघर्ष को समाप्त करना। मालिकों और नौकरों के संबंधों के विषय में श्री गांधी के जो विचार थे, वे 8 जून, 1921 के फ्नवजीवनय् में प्रकाशित हुए थे। उसका एक अंश नीचे उद्धृत किया जा रहा है -
फ्भारत के सामने दो रास्ते हैं। एक रास्ता पाश्चात्य सभ्यता का, जिसकी लाठी
उसकी भैंस का और दूसरा पूर्वी सभ्यता ‘सत्यमेव जयते’ का है, जिसमें
शक्तिशाली और कमजोर दोनों को समान रूप से न्याय पाने का अधिकार
है। आप जिस मार्ग को चाहे उसे पसंद करें। इस न्याय की प्रतिष्ठा हम
श्रमिक वर्ग की समस्या से आरंभ करके कर सकते हैं। प्रश्न यह है कि क्या
हिंसात्मक तरीकों से उनकी मजदूरी बढ़वाई जानी चाहिए? यदि वह संभव भी
हो, तब भी श्रमिक हिंसा जैसे मार्ग का सहारा नहीं ले सकते, उसके अधिकार
चाहे कितने भी न्यायोचित क्यों न हों। अधिकार प्राप्त करने के लिए और
उनकी सुरक्षा के लिए हिंसा का मार्ग भले ही सरल लगता हो, परंतु अंत में
यह कांटों भरा मार्ग है जो तलवार के बलबूते पर जीते हैं, उनका अंत भी
तलवार की धार से ही होता है। तैराक प्रायः डूब कर मरता है। यूरोप को
ही देखिए, वहां कोई प्रसन्न नहीं दिखाई पड़ता, क्योंकि वह संतुष्ट नहीं हैं।
श्रमिक पूंजीपति पर विश्वास नहीं करता और पूंजीपति श्रमिकों पर भरोसा
नहीं रखता। दोनों शक्तिमान हैं, परंतु तब भी दोनों सुखी व संतुष्ट नहीं हैं।
उनमें जबरदस्त संघर्ष होता है। हर प्रकार की प्रगति को उन्नति नहीं कहा
जा सकता। हमारे पास यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि यूरोप
के लोग उन्नति कर रहे हैं। उनके पास अतुल संपत्ति का होने का यह अर्थ
नहीं कि उनमें नैतिक अथवा आध्यात्मिक गुण भी हो।य्
×× ×× ××
यंग इंडिया, 26 जनवरी, 1921
धर्म मंथन, पृष्ठ 65