11. गांधीवाद - Page 303

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्तब हम क्या करें? बम्बई में श्रमिकों ने अच्छी नीति अपनाई है। मैं

उनके विषय में सभी तथ्यों को जानने की स्थिति में नहीं था। परंतु मैं इतना

देख सका कि वे अच्छे ढंग से लड़ सकते हैं। करोड़पति पूर्णतया गलती

पर हो सकता है। पूंजीपति और श्रमिकों के संघर्ष में यह प्रायः कहा जाता

है कि पूंजीपति और श्रमिकों के संघर्ष में पूंजीपतियों का पक्ष गलत होता

है। परंतु जब श्रमिक को अपनी शक्ति का पूरा आभास हो जाता है, तो मैं

समझता हूं कि पूंजीपति की अपेक्षा श्रमिक वर्ग अधिक निर्दयी हो जाता

है। यदि मजदूरों में करोड़पतियों से अधिक बुद्धि का विकास होता है, तो

करोड़पतियों को मजदूरों द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार काम करना पड़ता

है यद्यपि स्पष्ट है कि मजदूर वर्ग पूंजीपतियों की उस बुद्धि को कभी नहीं

प्राप्त कर पाता। यदि पूंजीपतियों की बुद्धि उसे प्राप्त हो जाए, तो वह श्रम

करना बंद कर देगा और स्वयं मालिक बन जाएगा, पूंजीपति केवल धन के

बल पर ही नहीं लड़ते। उनके पास बुद्धि और हिकमत भी होती है।

हमारे सामने प्रश्न यह है कि मजदूर जस के तस रह जाते हैं और जब

उनमें चेतना जगती है, तब वे क्या करें? यदि मजदूर अपने भाषण और संख्या

बल पर हिंसा का सहारा लेते हैं, तो यह उनके लिए आत्मघाती सिद्ध होगा।

ऐसा करके, वे देश के उद्योगों को हानि पहुंचाएंगे। इसके विपरीत यदि वे

न्याय पथ पर दृढ़ता से रह कर और कठिनाइयों को सहन कर अधिकार प्राप्त

करना चाहते हैं, तो उन्हें केवल सफलता ही नहीं मिलेगी, वरन् वे अपने

मालिकों को भी सुधार सकेंगे। अपने उद्योगों की प्रगति करेंगे और तब मजदूर

और मालिक दोनों एक ही परिवार के सदस्य के रूप में काम करेंगे।य्

इसी विषय पर श्री गांधी ने किसी दूसरे अवसर ख्1, पर कहा -

फ्भारत में पहले कभी भी पूंजी और श्रम के संबंधों में तनाव नहीं रहा।य्

अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मजदूरों के हाथ में हड़ताल का, जो हथियार है इस पर श्री गांधी के विचार ध्यान देने योग्य हैं। ख्2, श्री गांधी का कहना है - फ्एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बोलते हुए जिसने बड़ी सफलता के साथ हड़तालों का संचालन किया है, मैं हड़ताल कराने वाले नेताओं के मार्गदर्शन के लिए निम्नलिखित सिद्धांतों को दुहराता हूं -

  1. यंग इंडिया, 23 फरवरी, 1922

  2. यंग इंडिया, दिनांक 11 अगस्त, 1921