गांधीवाद
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(1) जब तक कोई वास्तविक शिकायत न हो, हड़तालें नहीं की जानी चाहिएं।
(2) यदि हड़तालियों में अपनी बचत के बल पर अथवा अन्य अस्थाई साधनों पर जैसे कि दफती बनाने का काम, सूत कातना, कपड़ा बुनना आदि साधनों पर निर्भर रहने की क्षमता न हो, हड़ताल नहीं करनी चाहिए। हड़तालियों को जनता के चंदे और दान पर कभी निर्भर नहीं रहना चाहिए।
(3) हड़तालियों को अपनी अपरिवर्तनीय न्यूनतम निश्चित मांग निर्धारित करनी चाहिए और हड़ताल पर जाने से पहले उसे घोषित करना चाहिए।
फ्यदि पुराने कर्मचारियों के बदले नए कर्मचारी भर्ती कर लिए जाते हैं, तो मजदूरों की मांगें वाजिब होते हुए भी और हड़तालियों में अनिश्चित काल तक हड़ताल चलाते रहने की क्षमता के बावजूद हड़ताल असफल हो सकती है। अतः बुद्धिमान लोगों को अपना वेतन अथवा सुविधाएं बढ़ाने के लिए उस समय हड़ताल नहीं करनी चाहिए, जब इस बात का आभास मिल जाए कि उनके स्थान पर दूसरे लोगों को काम पर लगाया जा सकता है। परंतु लोक कल्याण अथवा स्वदेश प्रेम की भावना वाला व्यक्ति मांग से अधिक आपूर्ति होते हुए भी अपने पड़ोसी की मुसीबतों से परेशान लोगों की सहानुभूति में हड़ताल कर सकेगा। मैंने जिस प्रकार की आम हड़ताल का उल्लेख किया है उसमें डराने, धमकाने और आग लगाने जैसी हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं है। मेरे सुझाव को कसौटी पर कसने से स्पष्ट हो जाता है कि हड़तालियों के सच्चे मित्रों ने कभी कांग्रेस-कोष से सहायता अथवा समर्थन प्राप्त करने की राय नहीं दी है। आर्थिक सहायता प्राप्त करने पर हड़तालियों के प्रति सहानुभूति की भावना क्षीण हो जाती है। सहानुभूति में की गई हड़ताल से असुविधाएं होती हैं और हमदर्दों को हानि उठानी पड़ती है।य्
संयुक्त-प्रांत ने जमींदारों के विरोध में किसान आंदोलन पर उन्हें समझाते हुए 18 मई, 1921 के यंग इंडिया के अंक में किसानों तथा जमींदारों के संबंधों की व्याख्या करते हुए श्री गांधी ने कहा -
फ्जब संयुक्त प्रांत सरकार औचित्य और सदव्यवहार की सीमा का उल्लंघन कर रही है और लोगों को धमकियां दे रही हैं, तो यह कहने में कोई संदेह नहीं कि किसान भी अपनी नवगठित शक्ति का बुद्धिमानी से प्रयोग नहीं कर रहे हैं। कई जमींदार ज्यादती करने की हद से आगे बढ़ गए बताए जाते हैं।