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गांधीवाद

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पाश्विक जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए अनिवार्य तत्व है और इसी से उसे निश्चिंतता मिलेगी और सुसंस्कृत जीवन संभव होगा, जो व्यक्ति मशीनों और आधुनिक सभ्यता का तिरस्कार करता है, वह उनका तात्पर्य ही नहीं समझता न उसे यह पता है कि मानव का परम लक्ष्य क्या है?

गांधीवाद उस समाज के लिए सर्वाधिक अनुकूल पड़ता है, जो प्रजातंत्र को अपना आदर्श नहीं मानता। जो समाज प्राजतंत्र में विश्वास नहीं रखता, वही मशीनों तथा उस पर आधारित सभ्यता की अनदेखी करेगा, परंतु प्रजातांत्रिक समाज मशीनों और आधुनिक सभ्यता का विरोध नहीं कर सकता। जो समाज मशीनों और आधुनिक सभ्यता के प्रति उदासीन है, कुछ थोड़े से लोगों के जीवन को निश्चिंत और सुसंस्कृत बनाकर ही संतुष्ट हो जाता है तथा शेष बहुसंख्यक जनता के लिए कठिन परिश्रम के जीवन का रास्ता बनता है, वह उचित नहीं है। परंतु प्रजातांत्रिक समाज अपने प्रत्येक नागरिक के जीवन को निश्चिंत करने का अवसर प्रदान करने की गारंटी देता है। यदि उपरोक्त विश्लेषण सही है, तब प्रजातांत्रिक समाज का नारा मशीनरीकरण होना चाहिए और अधिक से अधिक मशीनरी तथा आधुनिक सभ्यता का विकास होना चाहिए। गांधीवाद के अंतर्गत साधारण मनुष्य को थोड़ी सी मजदूरी के लिए लगातार परिश्रम करते रहना और पशुवत बने रहना चाहिए। संक्षेप में, गांधीवाद की प्रकृति की ओर वापसी की पुकार का अर्थ है बहुसंख्यक जनता को नग्नावस्था, मलिनता, निर्धनता और अज्ञान की ओर वापस लाना।

मानव-जीवन के विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग वर्गों का अस्तित्व नहीं मिटाया जा सकता। अनेक सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तनों से और वैधानिक रूप से दास-प्रथा समाप्त कर देने और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अवधारणा से भी विज्ञान के प्रसार में, पुस्तकों के माध्यम से सर्वसाधारण में शिक्षा के प्रसार से भी समाज में प्रबुद्ध वर्ग तथा अज्ञान वर्ग तथा श्रमिक वर्ग का जो अंतर है और रहेगा वह अंतर कभी न मिट सकेगा।

परंतु गांधीवाद केवल वर्ग बोध से ही संतुष्ट नहीं हो जाता, वरन् वर्ग भेद की संरचना पर जोर डालता है। गांधीवाद सामाजिक वर्गीकरण के ढांचे तथा आर्थिक ढांचे को अंग मानता है जिसके फलस्वरूप अमीर और गरीब, ऊंच-नीच, मालिक और मजदूर का जो अंतर मौजूद है, वर्ण, वर्ग तथा आय के आधार पर समाज में भेद मानने से बढ़कर और क्या हानिकारक हो सकता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समाज में वर्ग भेद, साधनसम्पन्न तथा साधनाविहीन दोनों वर्गों के लिए हानिकारक होता है। ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां सर्वसम्पन्न वर्ग तथा निर्धन वर्ग आपस में मिल