294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सकें। उनके कोई अंतरस्रोत नहीं हैं, न ही जीवन की आशाओं और आकांक्षाओं के आदान-प्रदान की कोई गुंजाइश है। निस्संदेह जनसामान्य में इस अलगाव के कारण सामाजिक एवं नैतिक बुराइयां स्वाभाविक हैं। उन्हें दासता की शिक्षा मिलती है और हीनभावना उत्पन्न होती है, जो दास-भाव की जननी है। दूसरी ओर साधनसम्पन्न वर्गों की भी अपनी सामाजिक तथा नैतिक समस्याएं होती हैं, हालांकि उनका प्रभाव न्यून होता है। अपने आर्थिक स्तर के कारण बहुसंख्यक समाज से अलग-थलग तथा कटे रहने के कारण उनमें विशिष्ट अधिकारप्राप्त गिरोह जैसी असामाजिक मनोवृत्ति पनप जाती हैं। वह निपट स्वार्थी हो जाते हैं। वे सभी से सशंकित हो जाते हैं। यहां तक कि सरकार के हितों के प्रति भी। समाज की ऐसी संवर्ग रचना से, उनकी संस्कृति निर्जीव होती है। उनकी कला दिखावटी हो जाती है। उनका धन चकाचौंध कर देने वाला होता है और व्यवहार फूलकुमारी जैसा। वास्तविकता यह है कि ऐसी वर्ग-संरचना में एक ओर उत्पीड़न, दम्भ, दर्प, मोह, स्वार्थ की बू हिलोरें मारती है, तो दूसरी ओर असुरक्षा, गरीबी, अपमान, पराधीनता के कारण साथ ही स्वावलंबन, स्वाधीनता, महत्ता और आत्म-सम्मान का अभाव देखने को मिलता है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज इन प्रवृत्तियों वाली समाज रचना के प्रति आंखें मूंद कर नहीं रह सकता। परंतु गांधीवाद को इन दूषित प्रकृतियों की कोई चिंता नहीं। यह कहना पर्याप्त न होगा कि गांधीवाद केवल वर्गभेद से संतुष्ट हो जाता है। यह भी कहना पर्याप्त नहीं है कि गांधीवाद वर्ग संरचना में विश्वास करता है, वरन् गांधीवाद इससे भी बहुत आगे है। वर्ग संरचना जो जर्जर, निस्तेज, जीर्ण-शीर्ण हो गई है, गांधीवाद उसी कंकाल को लादे चलना चाहता है। गांधीवाद वर्ग में विश्वास के साथ काम करने की प्रेरणा देता है। गांधीवाद में वर्गभेद संयोगवश नहीं आ घुसा है, बल्कि उसका आधिकारिक सिद्धांत है।
ट्रस्टीशिप का सिद्धांत हास्यास्पद है, जिसे गांधीवाद सभी विकारों को दूर करने का रामबाण नुस्खा होने की बात करता है और जिसके द्वारा धनी वर्गों के लोग अपनी संपत्ति को न्यास के रूप में रखकर, उसे गरीबों का न्यास और स्वयं को उसका न्यासी बनाकर मालिक ही बने रहेंगे। इस विषय में यही कहा जा सकता है कि यदि किसी अन्य ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया होता तो लेखक उसकी मूर्खता को बेहूदगी समझकर हंस देता कि उस सिद्धांतकार को वास्तविक कठिनाइयों का अता-पता ही नहीं है और दास वर्गों को यह कहकर धोखा दे रहा है कि नैतिकता एवं सदाचार के उपदेश मात्र से संपत्ति के मालिक, जो अपनी असीम तृष्णा की तृप्ति के लिए सदा से गरीबों की दुनिया को आंसुओं की सौगात दे रहे हैं उपदेश द्वारा स्वेच्छा से अपनी तृष्णा कम करके परोपकारी और त्यागी बन जाएंगे और वर्ग संरचना के कारण प्राप्त अधिकारों का दास वर्गों के विरुद्ध प्रयोग न करेंगे उनका