गांधीवाद
दुरुपयोग करना बंद कर देंगे।
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गांधीवाद का सामाजिक आदर्श जाति और वर्ग व्यवस्था पर आधारित है। इसमें संदेह नहीं कि इन दोनों के रहते गांधीवाद का सामाजिक आदर्श लोकतांत्रिक नहीं है। चाहे जाति से अथवा वर्ण से दोनों में से किसी की भी तुलना की जाए, वे दोनों ही मूल रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं। यह तो कुछ ठीक भी होता यदि गांधीवाद जाति व्यवस्था की पुष्टि दृढ़ता और ईमानदारी से करता। परंतु जाति व्यवस्था के पक्ष में उनकी वाकपटुता बेहूदा तर्क है। जाति व्यवस्था के पक्ष में गांधी जी द्वारा दिए गए तर्कों को कसौटी पर कसने पर हम इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि प्रत्येक तर्क यदि बचकाना नहीं, तो बनावटी अवश्य है, जिन्हेंं इसी अध्याय के द्वितीय खंड में दिया गया है।
प्रथम तीन तर्कों पर तो तरस आता है। पहला तर्क यह है कि हिंदू समाज आज तक जीवित है जबकि दूसरे समाज मिट गए। यह कोई तारीफ की बात नहीं है। इसके जीवित बचे रहने का कारण जाति व्यवस्था नहीं, वरन् कारण ये थे कि विदेशी जिन्होंने हिंदुओं पर आक्रमण किया उन्होंने इनका सफाया कर देना आवश्यक नहीं समझा। केवल जीवित बच जाना ही शान की बात नहीं है। जीवित रहने से क्या तात्पर्य है? कुछ लोग बिना शर्त के आत्म-समर्पण करके जीवित बच जाते हैं। कोई-कोई कायरता-पूर्वक पीछे हट कर पराजय मान कर जीवित रह जाते हैं और कुछ लोग शत्रु से लोहा लेकर अपनी जीवन रक्षा करते हैं। कैसे हिंदू जीवित रहें? यदि उन हिंदुओं के लिए कहा जाए कि वे शत्रुओं से लड़कर और उन्हें पराजित करके जीवित रहे, तो श्री गांधी द्वारा जाति व्यवस्था के पक्ष में दिया गया तर्क उचित है। हिंदुओं का इतिहास सदैव आत्म-समर्पण एवं अधम समर्पण का इतिहास रहा है। यह सच है कि दूसरे लोगों ने आक्रमणकारियों के समक्ष आत्म-समर्पण किया है। परंतु उन्होंने आत्म-समर्पण के बाद विदेशी शासकों के विरुद्ध विद्रोह किया। हिंदुओं ने विदेशी आक्रमणकारी की मार-काट का विरोध करने के बजाए पराधीनता स्वीकार कर ली और विदेशी शासन के जुए को उतार फेंकने के लिए एक-जुट होकर कभी विद्रोह नहीं किया। दूसरे यह कि हिंदुओं ने दासता में सुविधाधर्मी बनने का प्रयत्न किया, जबकि विश्व की अन्य जातियों ने हार जाने पर भी पराजय को कभी हृदय से स्वीकार नहीं किया और लगातार विद्रोह करती रहीं। ऐसी स्थिति को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि हिंदुओं की यह निस्सहाय स्थिति पूर्णतया जाति व्यवस्था के कारण रही है।
चौथे पैरा में दिया गया श्री गांधी का तर्क कुछ हद तक स्वीकार्य लगता है, जिसमें कहा गया है कि जातियों के माध्यम से शिक्षा के प्रसार तथा न्याय करने में सहायता मिल सकती है। परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि प्राथमिक शिक्षा प्रसार