296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अथवा लड़ाई-झगड़ों का फैसला करने का कार्य निपटाने के लिए जाति व्यवस्था ही एकमात्र साधन है। संभवतः ऐसे कार्य करने के लिए जाति व्यवस्था से घटिया साधन और कोई हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस से जातियों को बड़ी आसानी से प्रभावित तथा भ्रष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के कार्य अन्य देशों में भारत की अपेक्षा बेहतर ढंग से हुए हैं, यद्यपि वहां जाति प्रथा नहीं है। अच्छी सैनिक टुकडि़यां बनाने की बात हवाई किला है। व्यावसायिक सिद्धांत की पृष्ठभूमि में जाति व्यवस्था से लड़ाकू व्यक्तित्व निकालना संभव नहीं है। श्री गांधी मानते हैं कि उनके ही प्रांत गुजरात में किसी भी जाति ने सैनिक टुकड़ी नहीं खड़ी की। वर्तमान विश्व युद्ध में भी, यहां के लोगों ने कोई रुचि नहीं ली। पिछले विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार के एजेंट के रूप में सैनिक भर्ती के लिए श्री गांधी द्वारा गुजरात में भ्रमण करने पर भी जाति-प्रथा उन्हें एक सैनिक टुकड़ी नहीं दे सकी। वास्तव में जाति व्यवस्था के अंतर्गत साधारणतया लोगों को सेना के लिए तैयार करने का काम उस समय तक असंभव है, जब तक कि जाति व्यवस्था का व्यावसायिक सिद्धांत समाप्त नहीं कर दिया जाता।
जातियों के समर्थन में गांधी जी द्वारा पैरा 5 व 6 में दिए गए तर्क नीरस हैं और स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। पैरा 5 में दिया गया तर्क जिसमें अंतर्जातीय सहभोज और विवाहों का ख्ांडन किया गया है सही तर्क नहीं कहा जा सकता। यह सही है कि परिवार एक आदर्श इकाई है, जिसमें सभी सदस्यों में पारस्परिक प्रेम व्यवहार होता है यद्यपि उनमें पारस्परिक विवाह नहीं होते। यह माना जा सकता है कि वैष्णव परिवार के सदस्य सहभोज नहीं करते, परंतु तब भी उनमें पारस्परिक प्रेम और स्नेह बना रहता है। इससे क्या साबित होता है? इससे यह साबित नहीं होता कि सहभोज और पारस्परिक वैवाहिक संबंध बंधुत्व स्थापित करने के लिए आवश्यक नहीं है। इससे यह साबित होता है कि जहां बंधुत्व स्थापित करने के और भी साधन हैं - जैसे कि पारिवारिक बंधन की चेतना, वहां सहभोज और पारस्परिक विवाह संबंध आवश्यक नहीं हैं। परंतु जाति और परिवार में कोई संगति नहीं है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतर्जातीय खान-पान और शादी व्यवहार वर्जित नहीं है। इसलिए अंतर्जातीय खान-पान और विवाह संबंध आवश्यक है, क्योंकि जातियों के बीच संपर्क सूत्र नहीं है। जबकि परिवार के विषय में अन्य संपर्क सूत्र मौजूद हैं। वे जिन्होंने अंतर्जातीय सहभोज और विवाह के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने पर जोर दिया है, उन्होंने इसे सापेक्ष मूल्यों का प्रश्न बना लिया है। उन्होंने इन मूल्यों का स्तर बढ़ाकर सकल मूल्यों तक लाने के प्रयास नहीं किए। श्री गांधी इसे करने वाले पहले व्यक्ति हैं। अंतर्जातीय सहभोज अच्छा नहीं है चाहे उससे अच्छा परिणाम क्यों न निकले? क्योंकि किसी के सामने भोजन करना उतना ही गंदा काम है जितना शौच करना। जाति व्यवस्था का बचाव अन्य लोगों ने