11. गांधीवाद - Page 312

गांधीवाद

297

भी किया है। परंतु यह पहला अवसर है जिसमें मैंने देखा कि श्री गांधी का तर्क इतना लाजवाब है। इसे सुनकर कट्टठ्ठर से कट्टठ्ठर सनातनी हिंदू कहना चाहेगा कि फ्ऐसी बुद्धि वाले श्री गांधी से भगवान बचाए।य् इससे स्पष्ट है कि श्री गांधी कितने पक्के रंग में रंगे रूढि़वादी हिंदू हैं। वह कट्टठ्ठर से कट्टठ्ठर हिंदू को भी मात कर गए। इतना ही कहना पर्याप्त न होगा कि श्री गांधी अपने तर्क में आदिम गुफा सभ्यता से भी पीछे चले गए। यह तो वास्तव में किसी पागल व्यक्ति के तर्क जैसा है।

श्री गांधी ने पैरा 7 में जाति व्यवस्था के पक्ष में जो तर्क दिया है, नैतिक बल के निर्माण में उसका कोई महत्व नहीं है। निस्संदेह जाति व्यवस्था मनुष्य को उस स्त्री के साथ सहवास करने से रोकती है, जो उसकी जाति की नहीं है। जाति व्यवस्था मनुष्य को किसी अन्य मनुष्य के घर, जो उसकी जाति का नहीं है, बना भोजन कर अपनी भूख मिटाने से भी रोकती है। यदि नैतिक मूल्यों का उद्देश्य इन बिना सोचे-समझे प्रतिबंधों से पूरा होता है तब जाति व्यवस्था को नैतिक व्यवस्था स्वीकार किया जा सकता है। परंतु श्री गांधी यह नहीं देखते कि हिंदू जाति व्यवस्था में साधारण प्रतिबंधों के रहते, एक मनुष्य को अपनी ही जाति में सैकड़ों स्त्रियों से विवाह करने और सैकड़ों स्त्रियों के साथ सहवास करने की पूरी छूट है। हिंदू धर्म किसी मनुष्य को अपनी ही जाति के लोगों के साथ क्षुधा मिटाने की असीमित छूट देता है।

आठवां तर्क पूरे प्रश्न की जान है। पैतृक प्रणाली अच्छी या बुरी हो सकती है। कुछ लोग इससे सहमत होंगे, तो दूसरे असहमत भी होंगे। प्रश्न यह है कि पैतृक व्यवस्था को वैधानिक सिद्धांत का रूप क्यों दिया जाए? इसे अनिवार्य क्यों बनाया जाए? यूरोप में इसे वैधानिक सिद्धांत का रूप नहीं दिया गया है और न अनिवार्य ही किया गया। यूरोप में लोगों को पूरी स्वतंत्रता है कि वे चाहे पैतृक व्यवसाय को अपनाएं अथवा छोड़ें। यह कौन कह सकता है कि अनिवार्य व्यवस्था, स्वैच्छिक व्यवस्था की अपेक्षा अधिक कारगर सिद्ध हुई है। यदि भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति की तुलना यूरोप के लोगों की आर्थिक स्थिति से की जाती है, तो शायद की कोई समझदार व्यक्ति इस आधार पर जाति-प्रथा को माने, क्योंकि बार-बार व्यवसाय बदलने पर नए-नए नामकरण हो जाएंगे। यह मुश्किल है। यह आवश्यकता तभी पड़ती है जब किसी व्यक्ति को उसके व्यवसाय के नाम से जाना जाए। ऐसे वर्ग का ठप्पा लगाना व्यर्थ है और वे बिना कठिनाई के समाप्त किए जा सकते हैं। इसी के साथ आज के भारत में क्या हो रहा है? लोगें के व्यवसाय और उनके जाति सूचक ठप्पे मेल नहीं खाते। ब्राह्मण जूता बेचते हैं। कोई इस बात की आवश्यकता नहीं समझता कि उसका जाति नाम बदल कर उसे चमार कहा जाए। इसी प्रकार जब चमार कोई अधिकारी हो जाता