11. गांधीवाद - Page 313

298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है, तो कोई परवाह नहीं करता कि उसे ब्राह्मण कहा जाए। इस प्रकार श्री गांधी का यह तर्क पूर्णतया निरर्थक है। समाज में जाति के ठप्पे से ही लोग जाने जाते हैं। उनकी कोई आवश्यकता नहीं, वरन् आवश्यक यह देखना है कि उसने क्या सेवा की है।

जाति व्यवस्था के पक्ष में श्री गांधी द्वारा दिया गया अंतिम और नौवां तर्क बहुत ही आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक रूप में असत्य है। जिसने मनुस्मृति पढ़ी है, वह यह नहीं कह सकता कि जाति-प्रथा प्राकृतिक है। मनुस्मृति क्या कहती है? परंतु जिसे मनुस्मृति के विषय में तनिक भी जानकारी है, जाति व्यवस्था को वह प्राकृतिक व्यवस्था नहीं मान सकता। मनुस्मृति में प्रकट होता है कि जाति विधान हिंदुओं का कानूनी विधान है जिसे बलपूर्वक चलाया जाता रहा है। आज तक यह जिन कारणों से बचा हुआ है वे हैंः (1) जनसाधारण को शस्त्र ग्रहण करने से वंचित रखना, (2) जनसाधारण को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना, और (3) जनसाधारण को संपत्ति के अधिकार से वंचित करना। जाति-प्रथा प्राकृतिक नहीं है। इसे शासकों ने शासितों पर थोपा है।

श्री गांधी का जाति-प्रथा के समर्थन को छोड़कर वर्ण व्यवस्था की वकालत करने से इस आरोप पर कोई अंतर नहीं पड़ता कि गांधीवाद लोकतंत्र के विरुद्ध है। पहली बात तो यह है कि वर्ण व्यवस्था जाति-व्यवस्था की जननी है। यदि जातिवाद का विचार हानिकारक है, तो इसका मुख्य कारण वर्ण व्यवस्था द्वारा घोला गया जहर है। दोनों ही पैशाचिक हैं चाहे कोई वर्ण में विश्वास करे अथवा जाति में। बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था पर निर्दयता से प्रहार किया था। पाखंडी और वैदिक सनातनी हिंदू उन्हें विवेकपूर्ण उत्तर न दे सके। उनके पास केवल एक उत्तर था कि वर्ण व्यवस्था वेदों का आदेश है और जैसा कि वेद संशय से परे हैं, इसलिए वर्ण व्यवस्था वेद भगवान की वाणी होने के कारण मान्य है। बौद्धों के बुद्धिवादी तर्क के सामने वर्ण व्यवस्था की मूर्खतापूर्ण तर्वेंQ कहीं नहीं टिकतीं। यदि वर्ण व्यवस्था टिक सकी, तो केवल भगवद् गीता के कारण, जिसने वर्ण व्यवस्था का दार्शनिक आधार पर तर्क देकर सुदृढ़ किया कि वर्ण मनुष्य के स्वाभाविक गुणों पर आधारित है। भगवद् गीता ने सांख्यदर्शन की वैशाखी लगा कर वर्ण के आधार को पुख्ता और मजबूत कर दिया। भगवद् गीता ने वर्ण व्यवस्था को नया जीवन प्रदान करने के लिए स्वाभाविक गुणों का नाम देकर बहुत बड़ी धूर्तता की।

भगवद् गीता की वर्ण व्यवस्था में कम से कम दो गुण अवश्य हैं। गीता का यह कहना नहीं है कि वर्ण जन्म पर आधारित है। वास्तव में उनका मुख्य कथन यह है कि वर्ण मनुष्य के स्वाभाविक गुणों के अनुसार निश्चित है। गीता का यह कथन नहीं है कि बेटा वही व्यवसाय करेगा जो उसका बाप करता था। गीता का कहना है कि