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गांधीवाद

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किसी मनुष्य का पेशा उसके स्वाभाविक गुणों के अनुसार होगा, पिता का व्यवसाय पिता के स्वाभाविक गुणों के अनुसार होगा और बेटे का व्यवसाय बेटे के स्वाभाविक गुणों के अनुसार होगा। परंतु श्री गांधी ने वर्ण व्यवस्था को नई व्याख्या दी है। उन्होंने पुरानी मान्यता का रूप ही बदल दिया है। श्री गांधी के पूर्व सनातनी हिंदू जाति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी व्यवसाय अपनाने के सिद्धांत को मानते थे, वर्ण के आधार पर नहीं। परंतु श्री गांधी ने अपने मन से वर्ण की नई व्याख्या कर डाली। श्री गांधी के शब्दों में वर्ण का निर्धारण जन्म से होता है और वर्ण का व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी के सिद्धांत से निश्चित किया जाता है। मनुष्य वर्ण उसके जन्म के पूर्व ही निर्धारित रहता है। इसलिए वर्ण ही जाति का दूसरा नाम है। इस प्रकार श्री गांधी द्वारा की गई व्याख्या में जाति को वर्ण में बदल देने से यह संकेत नहीं मिलता कि उससे किसी नई क्रांतिकारी विचारधारा को बढ़ावा मिला है। श्री गांधी का यह करिश्मा आरंभ से अंत तक शरारत से भरा हुआ है। श्री गांधी के पेट में दाढ़ी है। वे वामन अवतार के समान हैं, जो जातिवाद का धोखा न करते तो बित्ते भर के ही रह जाते।

कभी-कभी श्री गांधी सामाजिक और आर्थिक विषयों पर ऐसे बातें करते हैं, जैसे वे छद्म साम्यवादी हों। वे लोग जो गांधीवाद का अध्ययन करेंगे, वे प्रजातंत्र के पक्ष में और पूंजीवाद के विरोध में समय-समय पर श्री गांधी के स्मृति-लोप से धोखा नहीं खाएंगे, क्योंकि गांधीवाद किसी भी अर्थ में क्रांतिकारी मत की श्रेणी में नहीं आता है। गांधीवाद टकसाली अनुदारवाद है। जहां तक भारत का संबंध है, गांधीवाद प्रतिक्रियावादी हवा है और आदिमयुग के आदर्शों की ध्वजा है। गांधीवाद का लक्ष्य है, भारत के समाधिस्थ अतीत को पुनर्जीवित करना।

गांधीवाद स्वयं में एक विरोधाभास है। गांधीवाद विदेशी शासन से देश को स्वतंत्र कराने का राग अलापता है, जिसका अर्थ है देश के वर्तमान राजनीतिक ढांचे को तहस-नहस करना साथ ही गांधीवाद उस सामाजिक ढांचे को मजबूत करना चाहता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक वर्ग से दूसरे वर्ग को दासता की कठोर बेडि़यों में जकड़ता चला आया है। क्या यह स्वयं में गांधीवाद के विरोधाभास का प्रमाण नहीं है? क्या स्वराज्य आंदोलन रूढि़वादी और गैर-रूढि़वादी सभी हिंदुओं का हार्दिक समर्थन प्राप्त करने के लिए श्री गांधी की कुशल रणनीति का भाग नहीं है? ऐसा ही है तो क्या गांधीवाद को ईमानदार और सही कहा जा सकता है? गांधीवाद के दो लक्षण हैं, जो प्रचारित किए गए हैं, परंतु दुर्भाग्यवश किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया। दूसरा प्रश्न है कि क्या गांधीवाद मार्क्सवाद की अपेक्षा अकिध स्वीकार्य होगा? परंतु गांधीवाद को मार्क्सवाद से अलग करने वाली कुछ बातों का उल्लेख करना ठीक ही है।

गांधीवाद का प्रथम मुख्य दर्शन है, साधन-संपन्न लोगों की सहायता करना, जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करना और जिनके पास कुछ नहीं है, उन्हें प्राप्त करने के