300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अधिकार से रोकना। जो मनुष्य हड़तालों के प्रति श्री गांधी के विचार, जाति-प्रथा के पक्ष में गांधीवाद का श्रद्धाभाव और गरीबों को लाभ पहुंचाने के नाम पर अमीरों द्वारा चलाए जाने वाले गांधीवादी ट्रस्टीशिप के सिद्धांतों का परीक्षण करेगा, वही गांधीवाद के असली लक्ष्य को समझ सकेगा। इसके संबंध में कई प्रकार के तर्क दिए जा सकते हैं। परंतु तथ्य यही है कि गांधीवाद संपन्न और समृद्ध लोगों का दर्शन है।
गांधीवाद का दूसरा मुख्य सिद्धांत है अपने शब्दों के जाल में समाज की बुराइयों को अच्छाइयों के आकर्षक रूप में प्रस्तुत कर लोगों को भ्रमित करना। इसे सिद्ध करने के लिए कुछ उदाहरण देना आवश्यक प्रतीत होता है।
पहला उदाहरण यह है कि हिंदुओं के तथा-कथित पवित्र कानून द्वारा शूद्रों (हिंदुओं का चतुर्थ वर्ण) को संपत्ति अर्जित करने से रोकना। यह बलपूर्वक निर्धनता थोपने वाला कानून दुनिया के किसी कोने में नहीं पाया जाता। इस कानून के प्रति गांधीवाद का क्या दृष्टिकोण है? क्या वह इस प्रतिबंध को हटाता है। नैतिक बल कह कर वह शूद्रों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे संपत्ति का परित्याग करें। श्री गांधी के शब्दों में ख्1, -
फ्शूद्र, जो केवल सवर्णों की सेवा करना अपना परम धर्म समझते हैं और
जिनकी अपनी कोई संपत्ति कभी नहीं होती, जो वास्तव में किसी वस्तु को
अपनाने की इच्छा भी नहीं करते अभिनन्दनीय हैं, देवतागण भी ऐसे पुरुषों
पर पुष्प वर्षा किए बिना नहीं रह सकते।य्
गांधीवाद विचार के समर्थन में जो दूसरा उदाहरण है, वह झाडू लगाने वालों के संबंध में है। हिंदुओं का तथाकथित पवित्र कानून इस बात का आदेश देता है कि भंगी की संतान के लिए भंगी का ही काम करना अनिवार्य है। हिंदू धर्म में भंगी का काम पसंद पर निर्भर नहीं करता, वरन् जबरदस्ती से कराया जाता है। इस संबंध में गांधीवाद शास्त्रीय मर्यादा को चिरस्थाई बनाने के लिए भंगी के कार्य को समाज की महानतम सेवा बतला कर उसे उसी गंदे काम में लगाए रखना चाहता है। अस्पृश्यों की एक सभा का सभापतित्व करते हुए श्री गांधी ने कहा था ख्2, -
फ्न मैं मोक्ष पाने की इच्छा करता हूं और न पुनर्जन्म की कामना करता हूं।
परंतु यदि मेरा पुनर्जन्म होवे ही तो मैं चाहूंगा कि मैं अस्पृश्य के घर में पैदा
वर्ण व्यवस्था से उद्धृत पृष्ठ 51
यंग इंडिया 27 अप्रैल, 1921