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गांधीवाद

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होऊं, ताकि मैं उनके कष्टों, मुसीबतों और तिरस्कार का अनुभव कर, उनका सांझीदार बन सकूं, और उन्हें उस दयनीय दशा से उबारने का प्रयत्न कर सकूं। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूं कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो, तो मेरा जन्म ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य अथवा शूद्र के घर में न होकर अति शूद्र के घर में हो।

फ्मुझे भंगी के कार्य से प्रेम है। मेरे आश्रम में एक 18 वर्ष का ब्राह्मण लड़का झाडू लगाने का काम कर रहा है, ताकि आश्रम का भंगी उससे सीखे कि आश्रम में झाडू कैसे लगानी चाहिए। वह लड़का कोई सुधारक नहीं है। वह रूढि़वादी हिंदू परिवार में पैदा हुआ है और पला है। परंतु उसने अनुभव किया कि उसकी सिद्धियां उस समय तक अधूरी रहेंगी, जब तक कि वह पूर्ण रूपेण भंगी नहीं बन जाता और इसलिए कि आश्रम का भंगी ठीक से सफाई करे, तो स्वयं सफाई कार्य करके उसके सामने उदाहरण प्रस्तुत करना आवश्यक है।

फ्तुम्हें यह समझना चाहिए कि तुम लोग हिंदू समाज की सफाई कर रहे हो।य्

क्या एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती थोपी गई इन परंपरागत बुराइयों को गांधीवाद द्वारा पुनर्जीवित करने के प्रयत्न से बढ़कर झूठा प्रचार करने का बदतर उदाहरण कहीं और मिल सकता है? यदि गांधीवाद संपत्ति का मोह त्यागने का उपदेश केवल शूद्रों को नहीं पूरे समाज के सभी वर्गों को देता, तो यही कहा जा सकता था कि यह भूल से ऐसा गलत विचार प्रकट कर दिया गया है। परंतु केवल एक ही वर्ग के लिए इसे क्यों अच्छा कहा गया है? मानव की बदतर मनोवृत्तियां दर्प और दंभ को सिर झुका कर स्वीकार करने की वह सीख एक वर्ग विशेष को क्यों दी जाती है, जिसे बौद्धिक आधार पर निर्मम विषमता मान कर वह उस पर क्षोभ व्यक्त करता? केवल भंगी को ही यह कहने से क्या लाभ कि ब्राह्मण भी झाडू लगाने को तैयार है, जबकि यह स्पष्ट है कि हिंदू शास्त्रों के अनुसार कोई ब्राह्मण झाडू लगाने का काम करने पर भी जन्मजात भंगी के समान भंगी नहीं हो जाएगा? क्योंकि भारत में कोई मनुष्य झाडू लगाने के काम के कारण ही भंगी नहीं होता। यह जाति और जन्म से भंगी होता है। इस बात का प्रश्न नहीं कि वह भंगी का काम करता है अथवा नहीं। यदि श्री गांधी इस आशंका से कि कहीं लोग इस काम को छोड़ न दें और यदि गांधीवादी पट्टठ्ठी पढ़ाते हैं कि झाडू लगाना एक गौरवपूर्ण कार्य है, तो इसे समझा जाना चाहिए। परंतु श्री गांधी भंगियों को ही सफाई कार्य करते रहने में ही गर्व करने की अपील यह कहतेऽ ख्1, हुए