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गांधीवाद

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इस दुर्भाग्य से अस्पृश्यों को मुक्ति दिलाने के लिए गांधीवाद क्या करना चाहता है? गांधीवाद अस्पृश्यता मिटाने का राग अलापता है और गांधीवाद की यह सबसे बड़ी विशेषता बताई जाती है। परंतु वास्तविक जीवन में यह विशेषता क्या गुल खिलाती है? ऐसी अस्पृश्यता निवारण को कसौटी पर कसने के लिए, जो गांधीवाद का मुख्य तत्व माना जाता है, श्री गांधी की योजना की सम्भावनाओं को भली-भांति समझ लेना नितांत आवश्यक है। क्या गांधीवाद की इस भावना का अर्थ इससे भी कुछ अधिक है कि अस्पृश्यों का स्पर्श करने में हिंदू हिचकिचाएंगे नहीं? क्या इसका अर्थ यह है कि अस्पृश्यों की शिक्षा पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया जाएगा। यह अधिक अच्छा होगा कि दोनों प्रश्नों पर अलग-अलग विचार करें।

पहले अस्पृश्यता के प्रश्न के तराजू पर श्री गांधी का विचार तौला जाए। श्री गांधी यह नहीं कहते कि अस्पृश्यों का स्पर्श हो जाने से नहाना अनिवार्य नहीं है। यदि श्री गांधी मानते हैं कि इसमें कोई एतराज नहीं कि अस्पृश्य होने पर शुद्ध होना ठीक है, तो यह कहना मुश्किल है कि ऐसे किस प्रकार अस्पृश्यता निवारण होगा? अस्पृश्यता तो यही है कि अस्पृश्य होने पर शुद्धि के लिए नहाया जाए। क्या इससे उनकी हिंदुओं के साथ समानता संभव है? श्री गांधी ने बहुत ही स्पष्ट कहा है कि इसका अर्थ यही है कि अंतर्जातीय सहभोज अंतर्जातीय अस्पृश्यता निवारण है। श्री गांधी का अस्पृश्यता निवारण, अस्पृश्य फ्अतिशूद्रय् की श्रेणी से उभरकर शूद्र वर्ग में आ जाएं। ख्1,

इससे अधिक और कुछ नहीं। श्री गांधी ने इस प्रश्न का विचार नहीं किया लगता कि क्या पुराने शूद्र नए शूद्रों को अपने समाज में शामिल करेंगे। यदि शूद्र अस्पृश्यों को अपने में मिलाने के लिए तैयार नहीं होते, तो ऐसी अस्पृश्यता निवारण निरर्थक है, क्योंकि इससे अस्पृश्य फिर भी अलग श्रेणी में ही रह जाएंगे। संभवतः श्री गांधी जानते हैं कि केवल अस्पृश्यता निवारण से शूद्र अति शूद्रों (अस्पृश्यों) को अपने में नहीं मिलाएंगे। इससे यह स्पष्ट हो जता है कि श्री गांधी ने अस्पृश्यों का दूसरा नाम फ्हरिजनय् क्यों रखा? अस्पृश्यों को फ्हरिजनय् कह कर श्री गांधी ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। उन्होंने दिखा दिया कि शूद्रों द्वारा अस्पृश्यों को अपने में मिलाना संभव नहीं है। श्री गांधी ने अस्पृश्यों को नया नाम फ्हरिजनय् देकर उन्हें सामाजिक धारा में मिलाने को भी असंभव बना दिया है।

जहां तक शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का संबंध है जो कि दूसरा प्रश्न है, यह सच है कि गांधीवाद शिक्षा प्राप्त करने के अस्पृश्यों के अधिकार पर हिंदू शास्त्रों द्वारा

  1. देखिए यंग इंडिया, 5 फरवरी, 1925