गांधीवाद
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धर्म का नवीन संस्करण प्रस्तुत करके गांधीवाद ने हिंदू धर्म की बड़ी सेवा की है। हिंदू धर्म अपने पुराने रूप में अनपढ़ धर्म था, जिसमें कठोर और निर्दयी विधानों के कोंण बने थे। गांधीवाद ने हिंदू धर्म की नग्नता को दार्शनिकता देकर ढक दिया। इस दार्शनिकता को उसका सार, एक सुंदर परिधान कहा जा सकता है। यह वह दर्शन है, जिसका कहना है कि फ्हिंदू धर्मय् में जो कुछ है, वही श्रेष्ठ है और जन कल्याण के लिए जो कुछ आवश्यक है, यह सब हिंदू धर्म में है। वे लोग जो वाल्टेयर से परिचित हैं, वाल्टेयर की पुस्तक ‘केन्डीड’ से स्पष्ट हो जाएगा कि गांधीवाद मास्टर पैंगीलोस के दर्शन जैसा है, जिसे वाल्टेयर ने भौंडा मजाक कहा है। निस्संदेह हिंदू लोग गांधीवादी दर्शन से बहुत खुश हैं। निस्संदेह यह उनके अनुकूल है और उनका हित साधक है। प्रोफेसर राधाकृष्णन ने तो पता नहीं मन से या चाटुकारितावश यहां तक कहा है कि श्री गांधी इस लोक के देवता हैं। अस्पृश्य इस कथन का क्या अर्थ लगाएं? क्या यह गांधी नामक देवता एक दीन दुःखिया जाति के आंसू पोंछने आया है? उन्होंने भारत को देखा और उसे बदल डाला, यह कहे बिना कि सब ठीक है और ठीक रहेगा बर्शें कि वह जात-पांत के विधान का पालन करते रहें। उसने पीडि़त जनता से कहा कि फ्मैं जात पांत के विधान का पालन कराने आया हूं, इसमें न माशा परिवर्तन होगा न रत्ती।य्
गांधीवाद अस्पृश्यों को कैसे धीरज बंधाता? हिंदूवाद अस्पृश्यों के लिए यातना गृह है। वेदों, स्मृति शास्त्रों की संशयहीनता का फौलादी कानून, निर्दयी कर्मवाद और जन्मगत अवस्था का विधान अस्पृश्यों को नीचे से ऊपर तक सताने वाला तपता खम्बा है जिसे हिंदुओं ने अस्पृश्यों के लिए खड़ा किया है। इन कुचक्रों ने अस्पृश्यों के जीवन को क्षत-विक्षत कर दिया। अस्पृश्य कैसे कह दें कि गांधीवाद हिंदुओं का परंपरागत यातना कुंड न होकर स्वर्ग द्वार है। उनकी एकमात्र प्रतिक्रिया और स्वाभाविक प्रक्रिया यही है कि वे गांधीवाद को दूर से ही प्रणाम करके भाग खड़े हों।
गांधीवादी कह सकते हैं कि मैंने जो कहा है, वह पुराने वाले गांधीवाद पर लागू होता है। नए गांधीवाद में जात-पांत नहीं है। अभी हाल ही में श्री गांधी के एक वर्णन के अनुसार जातिवाद अराजकता है। सुधारवादियों के चेहरे इस बयान से खिल उठे और यह जानकर किसे प्रसन्नता न होगी कि श्री गांधी जैसा मनुष्य, जिसका हिंदुओं में जादुई प्रभाव है, जिसने सामाजिक प्रतिक्रियावाद का शरारती खेल खेला है, जो जाति-प्रथा का धुरंधर समर्थक रहा है, जिसने अविवेकी हिंदुओं को अब तक उल्लू बनाया है, जिसके तर्कों में भले बुरे का भेद नहीं रहा। वह ऐसी पल्टी खा रहा है, तो क्या सचमुच प्रसन्नता की ही बात है?