306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
क्या इसे गांधीवाद की प्रकृति में कोई परिवर्तन कहा जा सकता है? क्या यह पहले के गांधीवाद की अपेक्षा नया और उससे अच्छा गांधीवाद है? वे लोग, जो श्री गांधी की इस कलाबाजी की भूलभुलैया में बहक जाते हैं, वे ऐसा करते समय दो बातें भूल जाते हैं। पहली बात तो यह कि श्री गांधी ने जाति-प्रथा की निंदा न कर उसे अराजकता मात्र कहा, इसे पैशाचिकता नहीं कहा। श्री गांधी जाति-प्रथा को अभिशाप नहीं करते। अब श्री गांधी जाति के पक्ष में नहीं हैं। परंतु श्री गांधी वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोलते। तब श्री गांधी की वर्ण व्यवस्था का क्या होगा? श्री गांधी की वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था का ही नया नाम है जिसमें जाति व्यवस्था के सभी अशुभ लक्षण विद्यमान हैं।
इस प्रकार श्री गांधी की नवीन घोषणा का अर्थ गांधीवाद में कोई मूल परिवर्तन नहीं माना जा सकता। नवीन घोषणा अस्पृश्यों को स्वीकार नहीं हैं। अभी भी अस्पृश्यों को यही कहना पड़ेगा फ्भगवान तेरा भला हो, क्या यही गांधी हमारे संरक्षक हैं?य्