अस्पृश्यों के लिए बारदोली कार्यक्रम पर स्वामी श्रद्धानंद के विचार - Page 324

परिशिष्ट

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फ्जैसा कि स्वामी श्रद्धानंद का नाम पहले आया है, वहीं संयोजक बनेंगे और इसलिए अन्य और किसी के नाम का प्रस्ताव लाने की कोई आवश्यकता नहीं है।य्

देश के सभी भागों से अस्पृश्यता के विषय में सदस्य अपने प्रांतों से सूचनाएं देने लगे और वहां जाने कि के लिए मुझ पर दबाव डालने लगे। इस पर मैंने कुछ वायदे भी किए। तब मैंने सोचा कि ऐसे प्राथमिक खर्चों के लिए बिना धन का प्रबंध किए काम नहीं चलेगा। धन के अभाव में क्षेत्र में जाकर जांच नहीं की जा सकेगी, जिससे इस कार्यक्रम हेतु कोई योजना बनाई जा सके। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि कार्य समिति द्वारा इलाहाबाद के फ्दि इनडिपेंडेंटय् के लिए 25,000 रुपये और हकीम अजमल खां की अर्जी पर दिल्ली के उर्दू दैनिक अखबार फ्कांगे्रसय् के लिए 10,000 रुपये स्वीकार किए जाने थे। इसीलिए मैंने कांगे्रस अध्यक्ष को अस्पृश्यता उप समिति के लिए 10,000 रुपये स्वीकार करने के लिए पत्र लिखा।

इस सब के बाद आपके पत्र संख्या 331 के साथ भेजा गया कार्य समिति का निम्नलिखित प्रस्ताव बड़ा दिलचस्प हैः-

फ्स्वामी श्रद्धानंद का पत्र दिनांक 8 जून 1922 जो दलित वर्ग के कार्य के लिए धनराशि के विषय में है। यह संकल्प किया जाता है कि श्री गंगाधर राव बी. देशपांडे को इस प्रयाजनार्थ नियुक्त उप समिति का संयोजक नियुक्त किए जाएं, और उनसे अनुरोध किया जाये कि वह स्वामी श्रद्धानंद के पत्र पर विचार करने के लिए उप समिति की बैठक शीघ्र बुलाएं।य्

एक और बात है जो स्पष्ट नहीं की जा सकती। मेरे प्रथम पत्र की प्राप्ति के बाद मैंने दूसरा पत्र हरिद्वार से दिनांक 3 जून, 1922 को लिखाःµ

फ्प्रिय श्री पटेल,

मैं परसों हरिद्वार से चल कर 6 जून, को लखनऊ पहुंचूंगा। आप जानते हैं कि मैं दलित वर्गों के लिए क्या भावना रखता हूं। यहां तक कि पंजाब में मैंने देखा कि उनके लिए कोई रचनात्मक कार्यक्रम नहीं बनाया गया है। संयुक्त प्रांत में यह कार्य निस्संदेह बड़ा दुष्कर कार्य होगा। परंतु दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई और है।

बारदौली योजना की मद संख्या (4) में प्रावधान है कि जहां अब भी जबरदस्त भेदभाव है वहां कांगे्रस कोष से अलग कुंए और अलग स्कूल खोले जाने चाहिएं। इसमें कांगे्रस कार्यकर्ता जो या तो दलित वर्ग से ईर्ष्या करते हैं अथवा अपने को अस्पृश्यों को सामान्य कुओं से पानी दिलाने में कमजोर पाते हैं, इसलिए कुछ भी नहीं करते। मैंने देखा कि बिजनौर जिले में अस्पृश्य कुओं से बेहिचक पानी भरते हैं। परंतु कुछ