परिशिष्ट
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योजना निश्चित करने के लिए कार्य समिति के पास समय नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में उप-समिति को मुझसे कोई लाभ होने वाला नहीं है, इसलिए मैं सदस्यता से त्यागपत्र देना चाहता हूं।
दिल्ली, जनवरी 30, 1922
आपका विश्वासपात्र
श्रद्धानंद सन्यासी
(2) महामंत्री का उत्तर
प्रिय स्वामी जी,
आपका दिनांक जून 1922 का पत्र, जो मेरे कार्यालय में 30 जून को प्राप्त हुआ, बम्बई में कार्यसमिति द्वारा में इस महीने की 18 तारीख को पारित संकल्प द्वारा मेरे पास इन अनुदेशों के साथ भेजा गया है कि मैं तथ्यों को स्पष्ट करूं और आपसे दलित वर्ग उप-समिति से अपने त्यागपत्र पर पुनः विचार करने का अनुरोध करूं।
जैसा कि आपको मालूम है, मेरे जेल से छूटने के पहले जो घटनाएं हुईं उसके बारे में मुझे मालूम नहीं है। परंतु मैं कार्य समिति की 10 जून, 1922 की उस बैठक में था, जिसमें श्री देशपांडे को उप-समिति का संयोजक नियुक्त किया गया था। तब ऐसी कोई बात स्पष्ट नहीं हुई थी कि उप-समिति के संयोजक के विषय उनके बारे में मैं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कोई बात तय की गई थी और आवश्यक औपचारिकताओं के बाद धन भुगतान के संबंध में संकल्प पारित कर दिया था। यह अनुभव किया गया था कि खर्च के लिए धन स्वीकृति से पहले उप-समिति की ओर से प्रस्ताव आना आवश्यक है। तदनुसार श्री देशपांडे को संयोजक नियुक्त किया गया और आरंभिक कार्यों पर खर्च के लिए 500 रुपये की स्वीकृति प्रदान की गई थी। भूल से प्रस्ताव में 500 रुपये का उल्लेख छूट गया। इस प्रकार आप देखेंगे कि अस्पृश्यता के लिए 10,000 रुपये की स्वीकृति कार्य समिति की अनिच्छा के कारण नहीं रह गई थी, बल्कि जैसा कि मैंने ऊपर स्पष्ट किया है, प्रस्ताव बनाते समय भूल से रह गई थी। आपकी उप-समिति के कार्य की महत्ता को नजरअंदाज करके ऐसा नहीं किया गया और आपके सुझाव की उपेक्षा नहीं की गई है। कार्य समिति की पिछली बैठक में आपका पत्र प्रस्तुत करने पर 500 रुपये की स्वीकृति जो छूट गई थी दे दी गई और तदनुसार मुझे आपको सूचित करने का आदेश दिया गया था। अस्पृश्यता की संपूर्ण समस्या के संबंध में आपकी विशेष जानकारी और अनुभव से यदि उप-समिति वंचित रह जाएगी, तो यह बड़े दुख की बात होगी। इसीलिए मैं जनहित में आपसे अनुरोध करूंगा कि उप-समिति से अपना त्यागपत्र वापस लेने के