अस्पृश्यों के लिए बारदोली कार्यक्रम पर स्वामी श्रद्धानंद के विचार - Page 328

परिशिष्ट

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संबंध में पत्र लिख कर डॉ. अंसारी ने दिनांक 17 जून, 1922 से यह पूछा कि क्या मुझे ही संयोजक नियुक्त किया गया है? डा. अंसारी आपके साथ हैं और आप उनसे इसकी पुष्टि कर सकते हैं। मुझे आशा है श्री पटेल इसे भूले नहीं होंगे।

(3) तब जबकि अस्पृश्यों के मध्य शीघ्रता से कार्य करना है, मैं किसी भी कारण से इसमें और विलम्ब नहीं करना चाहता। कृपया कार्य समिति की अगली बैठक में मेरा त्यागपत्र स्वीकार कर लें, ताकि अस्पृश्यता निवारण के संबंध में, मैं स्वतंत्रतापूर्वक स्वेच्छा से कार्य कर सकूं। पिछली जुलाई के अंत में मेरी यह स्थिति थी। अमृतसर और मियांवाली जेलों में प्राप्त सूचनाओं से मैंने अनुभव किया और मुझे पक्का विश्वास हो गया कि जब तक प्राचीन आर्यों के स्तर का ब्रह्मचर्य पुनर्जीवित नहीं किया जाता और भारतीय समाज से अस्पृश्यता का अभिशाप नहीं मिटा दिया जाता तब तक कांगे्रस अथवा कोई भी देशभक्ति की भावना से पे्ररित दल स्वराज प्राप्ति के लिए ठोस प्रयत्न नहीं कर पाएगा और राष्ट्रीय स्वावलम्बन तथा स्वराज के बिना कोई भी तेजस्विता असंभव है। अतः मैं जीवन का शेष भाग ब्रह्मचर्य और राष्ट्रीय एकता जैसे पवित्र कार्यों में लगाना चाहता हूं।

दिल्ली, जुलाई 23, 1922 आपका विश्वासपात्र

श्रद्धानंद सन्यासी