दलित वर्गों के लिए राजनीतिक संरक्षण प्रदान करना - Page 331

316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(2) दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली नहीं लागू की जाएगी और सुरक्षित सीटों पर कोई आंच नहीं आएगी। बशर्ते कि निम्नलिखित स्थिति होःµ

(क) उन सभी विधानमंडलों के सदस्यों की बहुमत की मांग पर मतदाताओं का

जनमतसंग्रह होगा, जिसमें दलित वर्गों के मतदाताओं ने स्पष्ट बहुमत से

मतदान किया हो।

(ख) ऐसे जनमतसंग्रह पर दुबारा बीस वर्ष तक कोई संशोधन नहीं किया जाएगा

और न उस समय तक जब कि पूर्ण वयस्क मताधिकार की व्यवस्था नहीं

हो जाएगी।

3 - दलित वर्गों को परिभाषित करने की आवश्यकता

दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व का पहले भी बुरी तरह दुरूपयोग हुआ है और प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए गैर-दलितों को नामांकित किया गया। ऐसे मामलों की कमी नहीं है, जिनमें दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने के लिए दलितों के स्थान पर अन्य लोगों को उनका प्रतिनिधि नामांकित किया गया है। वास्तव में ऐसी गड़बड़ी का कारण यह है कि दलित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए गवर्नर को जो उम्मीदवार नामांकित करने का अधिकार है उसमें यह नहीं कहा गया कि दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए, उन्हीं व्यक्तियों को ही मनोनीत किया जा सकता है, जो वास्तव में दलित हों, क्योंकि भावी संविधान में चुनावों द्वारा उनके प्रतिनिधियों का नामांकन होता है, तो ऐसी गड़बड़ी होने की गुंजाइश अब नही रखी जाएगी। इसीलिए कि ऐसे दुरूपयोग का अवसर न मिले हम विशेष प्रतिनिधित्व के लिए निम्नलिखित सुझाव पेश करते हैंःµ

(1) यह कि दलित वर्गों को केवल पृथक निर्वाचन का अधिकार ही न होगा,

वरन् यह अधिकार भी होगा कि उन्हीं वर्गों के उम्मीदवारों द्वारा उनका

प्रतिनिधित्व किया जाए।

(2) यह कि प्रत्येक प्रांत में दलित वर्गों की परिभाषा यह हो कि वही दलित

कहलाएगा, जिसके समुदाय के साथ अस्पृश्यता बरती जाती है, जैसा कि

चुनाव के उद्देश्य से तैयार सूची में उल्लेख किया गया है।

4 - नामकरण

दलित वर्गों के नामकरण पर उन्होंने तथा उनसे बाहर के लोगों ने एतराज किया है। वह शब्द अपमानजनक और तिरस्कारसूचक लगता है और अब अवसर आ गया है कि सरकारी कागजात में प्रयोग होने के लिए उस नाम को बदल कर नए संविधान