परिशिष्ट
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में कोई नया नाम रखा जाए। हम समझते हैं कि उन्हें गैर-सवर्ण हिंदू फ्प्रोटेस्टेंट हिंदूय् अथवा ‘नान-कंफर्म्ड हिंदू’ और दलित वर्ग के अतिरिक्त अन्य किसी नाम से पुकारा जाए। हमें किसी विशेष नाम के लिए दबाव डालने का कोई अधिकार नहीं। हम केवल राय दे सकते हैं और हमें विश्वास है कि जिस नाम को ठीक से स्पष्ट किया जाएगा और उनके लिए अनुकूल होगा, दलित वर्ग के लोग उसे अपनाएंगे।
हमारे इस मांग-पत्र में जो कुछ ऊपर कहा गया है, इसके समर्थन में भारत के कोने-कोने से दलित वर्ग के लोगों से असंख्य तार प्राप्त हुए हैं।
नवंबर 4, 1931