परिशिष्ट
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परिशिष्ट 4
श्री गांधी के आमरण अनशन पर बी.आर. अम्बेडकर द्वारा
जारी किया गया बयान।
गोलमेज सम्मेलन में अस्पृश्यों तथा उनकी संवैधानिक संरक्षण की मांग के प्रति श्री गांधी के रवैये के संबंध में बयान, दिनांक 19 सिंतबर, 1932
समाचारपत्रों में छपे श्री गांधी तथा सर सेमुएल होर और प्रधानमंत्री के मध्य हुए पत्र व्यवहार पर मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। दलित वर्ग के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की योजना को अंगे्रज सरकार अपनी इच्छा से अथवा जनमत के दबाव से संशोधित नहीं करती है अथवा योजना को वापस नहीं लेती। उस पर श्री गांधी ने आमरण अनशन करने का संकल्प व्यक्त किया है, उसे पढ़कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। श्री गांधी ने इस प्रकार की घोषणा कर मुझे जिस नाजुक परिस्थिति में डाल दिया, उसकी सहज में ही कल्पना की जा सकती है।
मैं सोचता हूं कि श्री गांधी जिन्होंने गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रश्न से उत्पन्न इस मुद्दे को व्यापक विषय की छोटी-सी बात कहा था, जान की बाजी कैसे लगा बैठे। वास्तव में, यदि श्री गांधी के दृष्टिकोण को शब्दबद्ध किया जाए तो सांप्रदायिक प्रश्न भारतीय संविधान का मुख्य अध्याय न होकर परिशिष्ट मात्र है। यदि श्री गांधी इतना बड़ा कदम देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उठाते, तो इसका औचित्य होता, जिसके लिए वह गोलमेज सम्मेलन में बराबर बल देते रहे। यह भी दुखद आश्चर्य है कि सामूहिक निर्णय में दलित वर्गों के लिए दिए गए विशेष प्रतिनिधित्व को ही अलग करके आत्म-बलिदान का बहाना ले रहे हैं। पृथक निर्वाचन केवल दलित वर्गों के लिए ही नहीं स्वीकार किया गया है, बल्कि भारतीय ईसाइयों, एंग्लो- इंडियनों यूरोपियनों, मुसलमानों और सिखों के लिए भी स्वीकार किया गया है। जमींदारों, मजदूरों और व्यापारियों के लिए भी पृथक निर्वाचन स्वीकार किया गया है। श्री गांधी ने मुसलमानों और सिखों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्गों और धर्मावलंबियों के विशेष प्रतिनिधित्व का विरोध किया था। अब श्री गांधी ने सबको छोड़कर केवल दलित वर्गों को स्वीकृत विशेष पृथक निर्वाचन को समाप्त करने का अपना मुख्य मुद्दा बनाया।
मेरे विचार में, श्री गांधी ने दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के परिणामों के विषय में, जो आशंका प्रकट की है, वह शुद्ध काल्पनिक है। यदि मुसलमानों और सिखों को पृथक निर्वाचन मिल जाने से राष्ट्र को खंडित होने का खतरा नहीं है, तो दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन दे देना हिंदू समाज का खंडित होना नहीं कहा जा