श्री गांधी के आमरण अनशन पर बी.आर. अम्बेडकर द्वारा जारी किया गया बयान - Page 340

परिशिष्ट

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मुस्लिम प्रतिनिधियों को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने ऐसी काली करतूत में श्री गांधी का हाथ बंटाने से इंकार कर दिया और दलितों को मुसलमानों और श्री गांधी द्वारा उत्पन्न संभावित स्थिति से बचा लिया।

सांप्रदायिक पंचाट के प्रति श्री गांधी का विद्रोह मेरी समझ में नहीं आता। वह कहते हैं कि इसके द्वारा दलित वर्ग सवर्ण हिंदू समाज से अलग कर दिए गए हैं। दूसरी ओर डॅाक्टर मुंजे, जो हिंदुओं के बहुत जबर्दस्त समर्थक हैं और उनकी वकालत करने वाले प्रमुख व्यक्ति हैं, के विचार इस विषय में बिल्कुल भिन्न हैं। लंदन से वापस आने के बाद डॉ. मुंजे ने जितने भाषण दिए हैं, उनमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि सांप्रदायिक निर्णय दलित वर्गों को हिंदुओं से पृथक नहीं करता। वास्तव में वह इस बात की शेखी बघारते हैं कि उन्होंने मुझे हिंदुओं से दलित वर्ग को राजनीतिक ढंग से अलग करने के प्रयत्नों में पराजित कर दिया। मुझे यकीन है कि डॉ. मुंजे सांप्रदायिकता की सही व्याख्या करते हैं। यद्यपि मैं इस बात में यकीन नहीं करता हूं कि इसका श्रेय डॉ. मुंजे को जाता है, इसलिए यह बड़े आश्चर्य की बात है कि श्री गांधी सांप्रदायिक व्यक्ति नहीं, वरन् राष्ट्रीय व्यक्ति कहे जाते हैं। दलित वर्गों से संबंधित सांप्रदायिक निर्णय का वह अर्थ लेते हैं, जो डॉ. मुंजे जैसे सांप्रदायिक व्यक्ति के ढंग से बिल्कुल विपरीत है। यदि डॉ. मुंजे जैसे सांप्रदायिक व्यक्ति के ढंग से बिल्कुल विपरीत है। यदि डॉ. मुंजे की दृष्टि में सांप्रदायिक निर्णय से दलित वर्गों के लोग हिंदुओं से अलग नहीं हो जाएंगे तो श्री गांधी को भी उस व्याख्या से संतोष कर लेना चाहिए था।

मेरे विचार में, सांप्रदायिक निर्वाचन में केवल हिंदुओं को ही नहीं संतुष्ट हो जाना चाहिए, वरन् दलित वर्गों के उन लोगों को भी संतुष्ट हो जाना चाहिए, जैसे-राव बहादुर राजा, श्री बालू और गवई, जो संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में हैं। विधान सभा में श्री राजा के गर्जन-तर्जन ने मुझे बहुत आश्चर्यचकित कर दिया। पृथक निर्वाचन के कट्टर समर्थक और सवर्ण हिंदुओं के अत्याचारों के कटुतम आलोचक होते हुए भी अब वह संयुक्त निर्वाचन के पक्षधर और हिंदुओं के पे्रमी हो गए हैं। इसमें कितना हाथ उन्हें गोलमेज सम्मेलन में शामिल न किए जाने का है और कितना ईमानदारी से विश्वास बदल लेने का, मैं इस पर बहस नहीं करना चाहता।

श्री राजा सांप्रदायिक पंचाट की जिस ढंग से आलोचना कर रहे हैं, उसके दो बिंदु हैं, एक तो यह कि दलित वर्गों को जनसंख्या के अनुपात में, जितनी सीटें मिलनी चाहिएं, सांप्रदायिक पंचाट में उससे कम सीटें हैं और दूसरे यह कि सांप्रदायिक पंचाट से दलित वर्ग के लोग हिंदुओं से अलग हो जाएंगे।

मैं उनकी पहली चिंता से सहमत हूं, परंतु गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व जिन लोगों ने किया है, उन पर दलित वर्ग के अधिकार बेचने का राव